तलाकशुदा आईएस पत्नी के ऑफिस के बाहर कूड़ा बीन रहा था गरीब पति। फिर जो हुआ इंसानियत रो पड़ी। दोस्तों, यह कहानी है उत्तर प्रदेश के अयोध्या की जहां दीपक और ज्योति की शादी नई-नई हुई थी। लेकिन जिंदगी बहुत बड़ी नहीं थी। बस उतनी थी जितनी दो लोग मिलकर संभाल सके। छोटा सा घर, सीमित आमदनी और रोजमर्रा की जरूरतों के बीच एक दूसरे का साथ ही उनकी सबसे बड़ी पूंजी था। दीपक सुबह काम पर निकलता और ज्योति घर की खिड़की से उसे जाते हुए देखती। जैसे किसी भरोसे को दूर तक जाते हुए देख रही हो। दीपक साधारण था। इतना साधारण कि उसने कभी खुद को खास समझा ही

नहीं। ना ज्यादा पढ़ा लिखा ना ऊंची बातें करने वाला। लेकिन उसकी सोच साफ थी और इरादे सीधे। वह मानता था कि अगर घर में शांति है तो जिंदगी अपने आप चल जाती है। ज्योति उससे बिल्कुल अलग थी। उसकी आंखों में हमेशा आगे निकल जाने की बेचैनी रहती थी। जैसे वह भीड़ में खड़े रहने के लिए बनी ही ना हो। उसे कुछ साबित करना था। खुद को, समाज को और शायद अपने अतीत को भी। वह देर रात तक किताबों में डूबी रहती, नोट्स बनाती, पुराने सवाल हल करती और कई बार बिना कुछ बोले घंटों सोचती रहती। दीपक उसे देखता रहता कुछ कहता नहीं क्योंकि उसे लगता था कि सपनों को शब्दों से नहीं सा से

ताकत मिलती है। एक रात जब दीपक काम से थक कर लौटा और ज्योति अब भी किताबों के बीच बैठी थी। उसने अचानक सिर उठाकर कहा कि वह आईएएस बनना चाहती है। उस वाक्य में ना कोई हिचक थी। ना कोई संदेह बस एक साफ फैसला था। दीपक ने कोई सवाल नहीं किया। ना यह पूछा कि कैसे होगा या कितना खर्च आएगा। उसने बस हल्की सी मुस्कान के साथ सिर हिलाया जैसे यह मान लिया हो कि अब उसकी जिंदगी की दिशा तय हो चुकी है। आईएस की तैयारी शुरू हुई तो खर्च भी बढ़ने लगे। कोचिंग की फीस, किताबें, फॉर्म और रहने खाने का हिसाब हर महीने बिगड़ने लगा। दीपक ने पहले अपनी नौकरी बदली फिर ओवरटाइम करने

लगा और बाद में रात की शिफ्ट भी पकड़ ली। वह देर रात लौटता थका हुआ लेकिन चेहरे पर कभी थकान नहीं लाता। उसे डर था कि अगर उसने कमजोरी दिखाई तो कहीं ज्योति के सपनों में भी दरार ना पड़ जाए। हर सुबह दीपक चाय बनाकर ज्योति के हाथ में देता और बस इतना कहता कि पढ़ लो देर मत करना। वह कभी-कभी खुद बिना नाश्ता किए निकल जाता क्योंकि उसे लगता था कि ज्योति का सपना पहले है भूख बाद में। धीरे-धीरे यह त्याग उसकी आदत बनता चला गया। हालात जब और कठिन हुए तो दीपक ने एक फैसला चुपचाप कर लिया। उसने किसी को बताए बिना अपने पिता की दी हुई छोटी सी जमीन बेच दी। क्योंकि उसे लगा

कि जमीन फिर मिल सकती है। लेकिन अगर सपना टूट गया तो शायद जिंदगी भर खुद को माफ नहीं कर पाएगा। समय बीतता गया और समाज की आवाजें तेज होने लगी। पड़ोस में लोग ताने मारते कि पत्नी आयज बनेगी और पति ऐसा। दीपक सब सुनता था। लेकिन घर आकर कभी कुछ नहीं कहता। वो नहीं चाहता था कि उसकी वजह से ज्योति के भीतर कोई संदेह या डर जन ले। वह हर ताने को अपने भीतर समेट लेता और चुपचाप आगे बढ़ता रहता। फिर वह दिन आया जिसका इंतजार बरसों से था। रिजल्ट आया और ज्योति का नाम सूची में था। वो आइस बन गई थी। उस दिन घर में कोई जश्न नहीं हुआ। ना ढोल बजे ना मिठाई बंटी। ज्योति रोई थी।

शायद खुशी से शायद राहत से। दीपक ने उसे गले लगाया और बहुत देर तक कुछ नहीं कहा जैसे शब्द उस पल छोटे पड़ गए हो। आईज बनने के बाद सब कुछ बहुत तेजी से बदलने लगा। ट्रेनिंग, नई पोस्टिंग और सरकारी औपचारिकताएं शुरू हो गई। ज्योति अब पहले जैसी नहीं रही थी। उसकी भाषा बदली। उसका उठना बैठना बदला और उसके आसपास के लोग भी बदल गए। उसे अब उस माहौल की जरूरत महसूस होने लगी थी जो उसके पद के अनुसार हो। कुछ ही समय बाद ज्योति ने फैसला किया कि वह सरकारी आवास में शिफ्ट होगी। उसने दीपक से कहा कि अब उसे अपने स्तर के माहौल में रहना होगा। जहां उसकी पहचान और पद का

सम्मान हो। दीपक ने कोई विरोध नहीं किया। उसने चुपचाप सिर हिलाया और उसे जाते हुए देखा। वह उसी पुराने घर में रह गया जहां दीवारों के सीलन और खामोशी अब ज्यादा गहरी लगने लगी थी। दूरी अब सिर्फ जगह की नहीं थी। सोच की भी थी। ज्योति व्यस्त रहने लगी और दीपक अकेला। फोन पर बातें कम होती गई और मुलाकातें औपचारिक। दीपक समझ रहा था कि कुछ बदल रहा है। लेकिन वह उस बदलाव को रोकना नहीं चाहता था। उसे लगता था कि अगर किसी को उड़ना है तो उसे बांधना सही नहीं। और उसी खामोशी के बीच रिश्ते में दरारें गहरी होती चली गई। फिर भी वह हर दिन खुद

को समझाता रहा कि यह दूरी जरूरी है। अस्थाई है। शायद समय के साथ ठीक हो जाएगी। ज्योति अब पहले की तरह घर नहीं आती थी। उसकी पोस्टिंग, ट्रेनिंग और मीटिंग्स ने उसकी जिंदगी को पूरी तरह घेर लिया था। जब वह कभी आती भी तो समय कम होता और बातें औपचारिक। दीपक हर मुलाकात के बाद महसूस करता कि वह उसके साथ होते हुए भी अकेला है। धीरे-धीरे ज्योति को वह घर छोटा लगने लगा। वो जगह जहां कभी उसने सपने देखे थे। अब उसे पीछे खींचती महसूस होती थी। उसे लगता था कि वह यहां रहकर अपनी नई पहचान को छोटा कर रही है और यही सोच उसके भीतर एक अजीब सा असंतोष भरने लगी। दीपक यह बदलाव

शब्दों में नहीं पकड़ पाता था। लेकिन आंखों से पढ़ लेता था। वो देखता था कि ज्योति अब उससे कम बात करती है। कम मुस्कुराती है और ज्यादा जल्दी में रहती है। वह कुछ पूछना चाहता था। लेकिन हर बार चुप रह जाता था। एक शाम जब ज्योति घर आई और जल्दी में बैग समेट रही थी। दीपक ने पहली बार बहुत हल्की आवाज में पूछा कि क्या सब ठीक है? ज्योति ने उसकी तरफ देखा। कुछ पल रुकी। फिर कहा कि सब ठीक है। बस जिंदगी आगे बढ़ रही है। उस जवाब में अपनापन नहीं था। सिर्फ सच्चाई थी। ज्योति के जाने के बाद उस रात दीपक देर तक सो नहीं पाया। छत की ओर देखते हुए उसे लगा कि

वह किसी ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां रास्ते अलग हो रहे हैं। उसे यह भी समझ आ रहा था कि अब कुछ पूछने से जवाब नहीं बदलेंगे। कभी-कभी चुप रहना ही सबसे बड़ा समझौता होता है। एक दिन ज्योति ने उसे मिलने के लिए बुलाया। आवाज में कोई घबराहट नहीं थी। बस एक औपचारिक आग्रह था। दीपक समझ गया कि यह मुलाकात सामान्य नहीं होगी। वह तय समय पर पहुंचा। ज्योति पहले से अपने ऑफिस में थी। उसका चेहरा शांत था। जैसे उसने अपने भीतर सब तय कर लिया हो। दीपक को उसी पल एहसास हो गया कि यह बातचीत वापस नहीं लौटेगी। ज्योति ने बिना घुमाए बात कही। उसने कहा कि वह अब इस रिश्ते को आगे नहीं

ले जाना चाहती। उसके शब्दों में ना गुस्सा था ना दर्द। बस एक साफ फैसला था। उसने कहा कि दीपक तुम अच्छा इंसान हो लेकिन जिंदगी सिर्फ अच्छाई से नहीं चलती। मुझे अपने स्तर, अपनी सोच और अपने भविष्य के हिसाब से जीना है और अब तुम्हारी दुनिया और मेरी दुनिया बिल्कुल अलग-अलग है। दीपक ने उसकी बात ध्यान से सुनी। उसके चेहरे पर कोई नाराजगी नहीं थी। वह समझ चुका था कि यह फैसला अचानक नहीं लिया गया है। यह बहुत पहले चुपचाप लिया जा चुका था। उसने बस इतना कहा कि अगर यही उसे सही लगता है तो वह कभी रुकावट नहीं बनेगा। उसने अपने त्याग का जिक्र नहीं किया। उसने यह भी

नहीं पूछा कि उसकी क्या गलती थी। क्योंकि कुछ सवालों के जवाब सिर्फ रिश्तों को और तोड़ते हैं। ज्योति को यह देखकर राहत महसूस हुई। उसे लगा कि उसने सही व्यक्ति को चुना था क्योंकि वह बिना शोर किए पीछे हट गया। उसके भीतर किसी तरह का पछतावा नहीं था। उसे यकीन था कि वह सही कर रही है। तलाक की बातें जल्दी ही कागजों तक पहुंच गई। सब कुछ बहुत शांत तरीके से हुआ। कोई लड़ाई नहीं, कोई आरोप नहीं। जैसे दो समझदार लोग एक अध्याय बंद कर रहे हो। दीपक ने कागजों पर बिना देर किए साइन कर दिए। उस पल उसके हाथ कांपे नहीं। लेकिन दिल के भीतर कुछ स्थाई रूप से टूट गया। उसने खुद

को यह जताने नहीं दिया। तलाक के बाद ज्योति अपनी नई जिंदगी, नई पहचान के साथ जीने लगी। और दीपक उसी पुराने घर में रह गया। जहां अब खामोशी उसकी सबसे बड़ी साथी बन चुकी थी। वह समझ रहा था कि अब जिंदगी आसान नहीं होगी। लेकिन उसे यह भी पता था कि उसने किसी की उड़ान नहीं रोकी और शायद यही उसका सबसे बड़ा सुकून था। दीपक पहले की तरह ही रोज सुबह उठता। कपड़े ठीक करता और खुद से कहता कि जिंदगी अभी खत्म नहीं हुई है। लेकिन सच्चाई यह थी कि भीतर कुछ टूट चुका था और बाहर सब कुछ बिखरने लगा था। अब मन भटकने के कारण काम सही से नहीं कर पाता था। इसलिए नौकरी भी कुछ दिनों बाद

छूट गई। अब जो थोड़ी बहुत बचत थी वो किराए, बिजली और खाने में धीरे-धीरे खत्म होने लगी। मकान मालिक का व्यवहार बदल गया। वो पहले नाम से बुलाता था। अब सिर्फ सुनो कहकर बात करता था। एक शाम साफ कह दिया गया कि अगला महीना नहीं निकाल पाएगा। दीपक ने कोई बहस नहीं की। उसने चुपचाप सिर हिलाया जैसे यह बात वह पहले से जानता हो। उस रात वो देर तक बैठा रहा और फिर अगली सुबह घर छोड़ दिया। अब उसके पास ना छत थी ना ठिकाना। कुछ दिन इधर-उधर रुका। लेकिन हर जगह उसे एहसास होता रहा कि वह बोझ बनता जा रहा है और बोझ बनकर जीना दीपक की फितरत में नहीं था। उसने दिहाड़ी मजदूरी शुरू

की। सुबह चौक पर खड़ा होता। कोई ले गया तो ठीक। नहीं तो पूरा दिन यूं ही बीत जाता। कभी ईंट होता कभी रेत। शरीर जवाब देने लगा। लेकिन पेट सवाल नहीं पूछता था। एक दिन ठेकेदार ने उसे अलग बुलाया। बोला भाई अब तुमसे यह काम नहीं होगा। कोई गुस्सा नहीं। कोई ताना नहीं। बस एक सच्चाई। उस दिन दीपक देर तक सड़क किनारे बैठा रहा। धूप तेज थी। पसीना बह रहा था और दिमाग में एक ही सवाल था। अब क्या? उसके पास कोई जवाब नहीं था। शाम तक भूख इतनी बढ़ गई कि पेट में ऐंठन होने लगी। उसने पास की दुकान से पानी मांगा और वहीं बैठकर पी लिया। उसी वक्त उसने देखा कुछ लोग बड़ी-बड़ी बोरियां

उठाए सड़क के किनारे किनारे चल रहे थे। वे कूड़ा बिन रहे थे। कोई प्लास्टिक उठा रहा था। कोई लोहे के टुकड़े। लोग उन्हें देख भी नहीं रहे थे। दीपक ने उन्हें ध्यान से देखा। उनके चेहरे गंदे थे। कपड़े फटे हुए थे। लेकिन उनके कदम रुक नहीं रहे थे। काम चल रहा था। रोजी चल रही थी। उस पल दीपक के भीतर कोई लंबा विचार नहीं आया। ना समाज की इज्जत ना भविष्य की चिंता। बस एक सीधी जरूरत थी। आज का खाना। उसने पास पड़ी एक पुरानी बोरी उठाई। हाथ कांपे लेकिन झुका वह। पहली बार सड़क पर। पहली बार सबके सामने। पहला कचरा उठाते वक्त उसकी सांस तेज हो गई। दिल जोर-जोर से धड़कने लगा।

लेकिन जब किसी ने कुछ नहीं कहा, कोई नहीं रुका तो उसे समझ आया। यहां किसी को फर्क नहीं पड़ता। पहला दिन बहुत भारी था। पीठ दर्द करने लगी। हाथों में जलन होने लगी। कई बार लगा कि यह उससे नहीं होगा। लेकिन शाम को जब उसने बोरी बेची और थोड़े से पैसे हाथ में आए तो आंखें भर आई। उस रात उसने पहली बार बिना उधार के खाना खाया। रोटी सूखी थी। सब्जी साधारण लेकिन पेट भरा था और उस भरे पेट ने उसे अगली सुबह उठने की ताकत दी। अगले दिन वो फिर निकला इस बार थोड़ा पहले जब शहर आधा सोया था। धीरे-धीरे उसे समझ आने लगा कि किस इलाके में क्या मिलता है। कहां प्लास्टिक ज्यादा है। कहां

लोहे का कबाड़। दिन बीतते गए। कूड़ा बिनना उसकी दिनचर्या बन गया। अब शर्म नहीं थी। बस थकान थी और मेहनत। इन्हीं रास्तों में एक बड़ा सरकारी ऑफिस भी पड़ता था। वहां कूड़ा ज्यादा मिलता था। दीपक ने वही इलाका पकड़ लिया। एक सुबह जब वह झुका हुआ कचरा उठा रहा था। एक सफेद गाड़ी आकर रुकी। सुरक्षाकर्मी उतरे। लोग हटने लगे। दीपक ने आतन सिर नीचे रखा। लेकिन किसी अनजानी वजह से उसने ऊपर देखा और सामने वह थी आईएएस अधिकारी ज्योति साफ कपड़े सीधी चाल चेहरे पर वही ठंडा आत्मविश्वास ज्योति की नजर भी उस पर पड़ी बस एक पल उस पल में ना कोई दर्द था ना कोई झटका उसके

चेहरे पर सिर्फ एक सोच थी मैंने सही फैसला लिया था वो बिना रुके आगे बढ़ गई और दीपक फिर झुक गया। उसके भीतर कुछ टूटा नहीं क्योंकि वह अब उम्मीद नहीं रखता था। दिनों तक यही चलता रहा। दीपक रोज कूड़ा बिनता ज्योति कभी कभी दूर से दिख जाती और हर बार उसका चेहरा और कठोर लगता। एक शाम दीपक बैठकर कूड़ा छान रहा था। तभी उसने गौर किया। सब कूड़ा बिनने वाले अलग-अलग बेच रहे हैं और सबको सही दाम नहीं मिल रहा। कई लोग ठगे जा रहे थे। कोई बोलने वाला नहीं था। दीपक पहली बार इस काम को सिर्फ मजबूरी नहीं एक सिस्टम की तरह देख रहा था। उस रात वो जमीन पर लेटा। देर तक सोचता रहा। पेट

भरा था लेकिन दिमाग जाग रहा था। उसे एक सीधी सी बात समझ आई। अगर सबका कूड़ा एक जगह इकट्ठा हो और सही दाम पर बेचा जाए तो मेहनत की कीमत बढ़ सकती है। यह कोई सपना नहीं था। बस एक जरूरत से निकला विचार और पहली बार उसे लगा कि शायद जिंदगी यहीं से कुछ और बन सकती है। उसने आंखें बंद की और बहुत दिनों बाद नींद आई। अगली सुबह वो पहले से ज्यादा जल्दी उठा। बोरी कंधे पर डाली। लेकिन आज उसके कदमों में एक अलग ठहराव था। वह सिर्फ कूड़ा नहीं उठा रहा था। वह लोगों को देख रहा था। कौन कितना लाता है, कौन कहां बेचता है और कौन सबसे ज्यादा ठगा जाता है। उसे समझ में आने लगा

कि इस काम में मेहनत बराबर है। लेकिन दाम बराबर नहीं। जो ज्यादा तेज बोलता है वही ज्यादा कमा लेता है और जो चुप रहता है वह रोज वही मेहनत करके भी आधा पैसा पाता है। दीपक को यह अन्याय नया नहीं लगा। उसने पूरी जिंदगी यही देखा था। तीन दिन तक उसने किसी से कुछ नहीं कहा। बस ध्यान से देखता रहा। सुनता रहा। चौथे दिन उसने पहली बार एक बुजुर्ग कूड़ा बिनने वाले से पूछा। अगर मैं तुम्हारा सारा माल एक साथ ले लूं तो तुम बेचोगे। बुजुर्ग ने हैरानी से देखा। फिर हंस दिया। उसे लगा यह आदमी भी भूखा ही है। दीपक ने अगले दिन सच में उसका सारा कूड़ा खरीद

लिया। थोड़ा सस्ता लेकिन पक्का। बुजुर्ग को उस दिन पहली बार तय पैसा मिला। उसकी आंखों में अविश्वास था और दीपक के भीतर एक नई जिम्मेदारी। धीरे-धीरे बात फैलने लगी। पहले दो लोग आए फिर चार। दीपक किसी को मजबूर नहीं करता था। बस कहता था जो चाहो बेचो नहीं तो अपनी जगह बेचो। लोगों को यह तरीका समझ में आने लगा। अब समस्या दूसरी थी। इतना कूड़ा रखा कहा जाए। दीपक ने शहर के किनारे एक टूटी फूटी जगह देखी। पुराना गोदाम आधी छत गिरी हुई दीवारों पर झाड़ियां मालिक को कोई मतलब नहीं था बस महीने का थोड़ा पैसा चाहिए था दीपक ने बिना सौदेबाजी हा कर दी पहली बार उसके पास

जगह थी छोटी बदबूदार लेकिन अपनी वही बैठकर वह कूड़ा छांटता गिनता और बड़े कबाड़ी से बात करता शुरुआत में दाम वही मिले लेकिन मात्रा बढ़ने लगी बड़े कबाड़ी वाले ने खुद पूछा, इतना माल कहां से ला रहा है? दीपक ने सच बताया। बड़े कबाड़ी वाले ने दाम थोड़ा बढ़ा दिए और वहीं से खेल बदलने लगा। अब दीपक सिर्फ कूड़ा बिनने वाला नहीं था। वो जोड़ने वाला बन गया था। लोग सुबह-सुबह उसी के गोदाम पर आने लगे। कोई प्लास्टिक लाता, कोई लोहे के टुकड़े, कोई पुरानी बोतलें, दीपक सब तौलता, सबका हिसाब रखता। कोई धोखा नहीं, कोई काट छांट नहीं। शाम तक सबको पैसा मिल

जाता। शहर में पहली बार कूड़ा बिनने वालों को भरोसा मिलने लगा। उसी भरोसे ने काम बढ़ाया। अब गोदाम छोटा पड़ने लगा। दीपक ने एक और दूसरी जगह ली। फिर तीसरी। अब वह खुद कूड़ा नहीं बीनता था। लेकिन रोज सुबह सबसे पहले वही पहुंचता था। आईस ऑफिस के बाहर अब वह झुका हुआ नहीं दिखता था। वह दूर से देखता कुछ कूड़ा बिनने वाले का हिसाब करता फोन उठाता। ज्योति की गाड़ी अब भी कभी-कभी दिखती थी। लेकिन अब दीपक सिर नहीं झुकाता था। वह बस देखता था बिना कुछ महसूस किए। एक दिन ज्योति ने नोटिस किया कि ऑफिस के बाहर कूड़ा कम हो गया है। सफाई बेहतर है। लोग

समय पर आते जाते हैं। उसने पूछा यह सब कैसे? किसी ने कहा, मैडम अब यहां एक आदमी है। सब उससे बेचते हैं। ज्योति ने ध्यान नहीं दिया। उसके लिए यह बस एक प्रशासनिक सुधार था। लेकिन दीपक के लिए यह उसकी पहली जीत थी। बिना किसी पद, बिना किसी कुर्सी। काम बढ़ता गया। महीने बदलने लगे। गोदाम अब पक्के हो गए। दीपक ने पहली बार एक पुराना स्कूटर खरीदा। फिर एक छोटा ट्रक। फिर दो ट्रक। उसके कपड़े अब भी साधारण थे। लेकिन आंखों में अब खाली पर नहीं था। वो लोगों की जिंदगी चला रहा था और अपनी भी। लेकिन वह जानता था पहचान आने में समय लगता है और

उसे जल्दी नहीं थी। इसी तरह वक्त अपनी रफ्तार से बढ़ता रहा और कुछ सालों बाद दीपक शहर का सबसे बड़ा कूड़ा वाला व्यापारी बन गया। अब उसका कारोबार करोड़ों में होने लगा और अब पूरे शहर में उसके नाम की चर्चाएं होने लगी। फिर एक श्याम दीपक के पास एक कॉल आया। नंबर अनजान था लेकिन आवाज में औपचारिकता थी। कॉल एक कॉलेज से थी बिजनेस मैनेजमेंट डिपार्टमेंट से। उन्होंने बताया कि शहर में जिस तरह से आपने कूड़ा खरीद और प्रबंधन का नेटवर्क खड़ा किया है। उसकी चर्चा अब अकादमिक स्तर तक पहुंच चुकी है। हम चाहते हैं कि आप छात्रों से सीधे बात करें। उन्हें बताएं

कि जमीन से शुरू हुआ काम कैसे एक व्यवस्था बन सकता है। दीपक ने कुछ नहीं बोला। कुछ देर सोता रहा क्योंकि उसने कभी कॉलेज नहीं देखा था। कभी किसी मंच पर नहीं खड़ा हुआ था। लेकिन इस बार उसके भीतर डर नहीं था। शायद इसलिए क्योंकि अब उसके पास छिपाने के लिए कुछ नहीं था। उसने कार्यक्रम के लिए हामी भर दी। लेकिन कार्यक्रम से एक दिन पहले आयोजक का फिर फोन आया। सामान्य सी बातचीत के बीच उसने सहज ढंग से बताया सर इस सेमिनार में शहर की आईएएस अधिकारी ज्योति मैडम भी मुख्य अतिथि होंगी। दीपक कुछ पल चुप रहा। उसने कोई सवाल नहीं किया। कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। बस फोन रखते हुए

हल्का सा सिर हिला लिया। जैसे वह इस सच्चाई से भागना नहीं चाहता हो। उस रात उसने ज्यादा सोचा नहीं क्योंकि उसने खुद से तय कर लिया था। अब जिंदगी में जो भी सामने आएगा वह उसे बिना झुके स्वीकार करेगा। अगले दिन कॉलेज का सभागार भरा हुआ था। मंच सजा था। छात्र उत्साहित थे। दीपक मंच के पीछे खड़ा था। शांत स्थिर कपड़े साधारण थे। लेकिन शरीर की भाषा में संकोच नहीं था। जब आईएस ज्योति सभागार में पहुंची दीपक की नजर उस पर पड़ी वही आत्मविश्वास वही गरिमा बस फर्क इतना था कि इस बार वह झुका हुआ नहीं था कार्यक्रम शुरू हुआ ज्योति ने मंच से अपनी तय बातें कही

अनुशासन मेहनत और व्यवस्था तालियां बजी दीपक चुपचाप सुनता रहा उसके भीतर ना गुस्सा था ना दुख बस एक अजीब सी साफ समझ थी कि समय ने दोनों को अलग-अलग जगह पहुंचा दिया है। फिर एंकर ने दीपक का नाम लिया। शहर का सबसे बड़ा कूड़ा खरीद नेटवर्क खड़ा करने वाला स्थानीय उद्यमी। दीपक मंच पर आया। उसने किसी को प्रभावित करने की कोशिश नहीं की। उसने बस सच कहा कि कैसे मजबूरी में उसने कूड़ा उठाया और कैसे उसी मजबूरी में उसने व्यवस्था की कमी देखी। उसने बताया कि उसका सपना अमीर बनना नहीं था। बस इतना था कि मेहनत करने वाले को सही दाम मिले। उसने कहा मैंने यह काम इज्जत के लिए

नहीं शुरू किया था। मैंने इसे पेट के लिए शुरू किया था। इज्जत अपने आप आ गई। सभागार में सन्नाटा छा गया। ज्योति उसे देख रही थी। अब वह अधिकारी नहीं थी। बस एक इंसान थी जो अपने अतीत को सामने खड़ा देख रही थी। कार्यक्रम खत्म होने के बाद जब भीड़ कुछ कम हुई ज्योति खुद दीपक के पास आई। उसकी आवाज धीमी थी। उसने स्वीकार किया कि जब उसने कभी ऑफिस के बाहर झुके हुए दीपक को देखा था। तो उसे लगा था कि उसका फैसला सही है। आज समझ आया। उसने कहा कि मैंने हालात देखे थे। इंसान नहीं। दीपक ने शांत स्वर में जवाब दिया। गलती समझ आ जाना ही काफी होता है। ज्योति ने

उम्मीद से उसकी ओर देखा। दीपक ने साफ शब्दों में कहा, मैंने तुम्हें माफ कर दिया है। लेकिन मैं तुम्हें अपना नहीं सकता क्योंकि जब मैं टूटा था तब तुमने मुझे नहीं चुना। और अब जब मैं खड़ा हूं तब लौटना। मेरे लिए सही नहीं है। वो बिना शोर किए चला गया। बिना आरोप लगाए। ज्योति वहीं खड़ी रह गई। उसके पास पद था, सम्मान था, पहचान थी। लेकिन भीतर एक ऐसा खालीपन था जो किसी फाइल, किसी कुर्सी या किसी उपलब्धि से भरने वाला नहीं था। दोस्तों, इस कहानी की सबसे बड़ी सीख यही है कि जिंदगी में अक्सर ऐसा नहीं होता कि गलत इंसान सजा पाए और सही इंसान इनाम। कई बार सही इंसान बस

चुपचाप सहता चला जाता है। और गलत फैसले लेने वाला आगे बढ़ता चला जाता है। अब असली सवाल आपसे है। दीपक ने जो फैसला लिया वह सही था या गलत? क्या उसे माफी के बाद ज्योति को फिर अपना चाहिए था? या फिर आत्मसम्मान के लिए रिश्ता वही खत्म कर देना ही सही था? सच्चे दिल से अपनी राय कमेंट में जरूर लिखिए। और साथ में बताइए आप दीपक की जगह होते तो क्या करते? और हां अगर यह कहानी आपके दिल तक पहुंची है तो वीडियो को लाइक कीजिए और चैनल स्टोरी बाय एसके को सब्सक्राइब जरूर कीजिए। मिलते हैं अगले वीडियो। जय हिंद। जय