उसके झुर्रीदार हाथ में वह काग़ज़ था जो ज़मीन की मालिकाना हक़ की पुष्टि करता था।
10 रुपये।
बस यही उसने उस ज़मीन और घर के लिए चुकाया था।
वही 10 रुपये, जो गाँव में झंडा उठाने और छोटे-मोटे काम करते हुए तीन साल की सारी जमा-पूँजी थे।
“आशा जी पागल हो गई हैं,”
पड़ोस की औरतों ने कहा था, जब उन्हें यह बात पता चली।

“कोई भी आदमी 10 रुपये में खेत नहीं बेचता, जब तक उसमें कुछ गड़बड़ न हो।”
लेकिन आशा ने उनकी बातों पर ध्यान नहीं दिया।
52 साल की उम्र में, चार साल से विधवा, उसके दो बेटे अब राजधानी में रहते थे।
वह बस अपना एक ठिकाना चाहती थी —
थोड़ी-सी ज़मीन,
एक ऐसा घर जहाँ उसे किसी को किराया न देना पड़े,
एक छत जो सचमुच उसकी हो।
कच्चा रास्ता उसकी घिसी हुई चप्पलों के नीचे चरमराता था।
पीछे गाँव धीरे-धीरे छोटा होता जा रहा था।
आगे, झाड़ियों और काँटेदार पौधों के बीच, उसके नए घर की आकृति उभर रही थी।
वह एक साधारण-सा मिट्टी का घर था,
ऊपर जंग लगी टीन की छत।
दीवारों में दरारें थीं — जैसे किसी बूढ़े चेहरे की झुर्रियाँ —
मगर वे अब भी खड़ी थीं।
दो खिड़कियाँ थीं, बिना काँच के,
सिर्फ़ सड़ी हुई लकड़ी के चौखटे।
दरवाज़ा टेढ़ा होकर किवाड़ों से लटका हुआ था।
“कुछ खास नहीं है,”
आशा ने खुद से बुदबुदाया, दुपट्टे से माथे का पसीना पोंछते हुए।
“लेकिन… यह मेरा है।”
आस-पास की ज़मीन काफ़ी फैली हुई थी।
वह सोचने लगी कि यहाँ साग-सब्ज़ी उगाई जा सकती है,
लौकी, कद्दू,
शायद कुछ मुर्गियाँ भी पाली जा सकती हैं।
वह अपने आने वाले दिनों की कल्पना करने लगी —
सुबह मुर्गे की बाँग से उठना,
छोटी-सी बगिया को पानी देना,
और ज़मीन जितना दे, उसी में जीवन बिताना।
जिस बुज़ुर्ग, मोहनलाल, ने उसे यह ज़मीन बेची थी,
वह अब अपनी बेटी के साथ जयपुर में रहता था।
जब आशा सौदा पक्का करने उससे मिलने गई,
तो बूढ़े की आँखें धँसी हुई थीं
और हाथ काँप रहे थे।
“क्या आप सच में तय कर चुकी हैं, बहनजी?”
उसने यह सवाल तीन बार पूछा।
“पूरी तरह,” आशा ने कहा।
बूढ़े ने गहरी साँस ली,
जैसे बरसों से ढोया हुआ कोई बोझ उतार रहा हो।
“सच बताऊँ,” उसने कहा,
“यह खेत पंद्रह साल से वीरान पड़ा है।
मेरी पत्नी की मौत के बाद
मैं वहाँ लौट ही नहीं पाया।
यादें…
कभी-कभी यादें पत्थरों से भी भारी होती हैं।”
आशा ने सिर हिलाया।
वह भी जानती थी यादों का वज़न।
वह जानती थी आधी रात को जागकर
किसी ऐसे इंसान को ढूँढना कैसा लगता है
जो अब इस दुनिया में नहीं है।
“मैं समझती हूँ,” आशा ने कहा,
“मगर मुझे पुरानी दीवारों से डर नहीं लगता,
न ही दूसरों की यादों से।
जो मुझे डराता है,
वह है बिना छत के रहना।”
बूढ़े ने उसे दया-भरी नज़र से देखा,
फिर काग़ज़ों पर दस्तख़त कर दिए।
उसने एक जंग लगी चाबी दी
और उसका हाथ थाम लिया।
“भगवान आपकी रक्षा करे,”
उसने कहा।
वे शब्द हवा में तैरते रह गए —
किसी अपशकुन की तरह।
अब, अपने नए घर के दरवाज़े के सामने खड़ी,
आशा ने चाबी ताले में डाली।
थोड़ा ज़ोर लगाना पड़ा,
फिर दरवाज़ा चरमराते हुए खुल गया।
अंदर से जो गंध आई,
वह सड़ी हुई नहीं थी —
बस नम, मिट्टी जैसी,
जैसे लंबे सूखे के बाद पहली बारिश।
टूटी खिड़कियों से धूप अंदर आ रही थी,
हवा में उड़ती धूल को रोशन करती हुई।
बीच में एक मेज़ थी,
जिस पर मिट्टी और सूखे पत्ते जमे थे।
दो टूटी-फूटी कुर्सियाँ,
कोने में लकड़ी का चूल्हा,
जिसकी राख इतनी पुरानी थी
कि जैसे पत्थर बन गई हो।
दीवार पर 2009 का एक कैलेंडर टँगा था,
जिसमें समुद्र तट की तस्वीर थी —
एक ऐसी जगह
जहाँ आशा कभी नहीं जाएगी।
“चलो, शुरू करते हैं,”
उसने ज़ोर से कहा,
खुद को हिम्मत देने के लिए।
उसने अपना थैला ज़मीन पर रखा
और अपनी थोड़ी-सी चीज़ें निकाली —
एक झाड़ू,
एक पोछा,
पानी का डिब्बा,
कुछ मोमबत्तियाँ
और देवी दुर्गा की एक छोटी तस्वीर
जो हमेशा उसके साथ रहती थी।
उसने तस्वीर को दीवार की कील पर टाँगा
और हाथ जोड़ लिए।
“माँ, अब यहीं रहूँगी।
मेरी रक्षा करना।”
वह झाड़ू लगाने लगी।
धूल के बादल उसे खाँसी दिला रहे थे,
मगर वह रुकी नहीं।
कमरा, छोटा सा शयनकक्ष,
और रसोई बनने वाला कोना —
हर जगह बरसों की उपेक्षा झलक रही थी।
मकड़ी के जाले परदों जैसे मोटे थे,
चूहों की सूखी बीट,
छत से गिरी मिट्टी।
दोपहर हो चुकी थी
जब उसने काम पूरा किया।
वह एक कुर्सी पर बैठी
और कपड़े में लिपटी रोटी-दाल खाई।
खामोशी गहरी थी।
कोई पक्षी नहीं,
कोई हवा नहीं,
कुत्ते की दूर की आवाज़ भी नहीं।
“अजीब है,” उसने सोचा,
मगर थकान ज़्यादा थी।
शाम को उसने खिड़कियाँ साफ़ कीं,
जाले हटाए,
मिट्टी का फर्श पोछा।
सूरज ढलते-ढलते
घर कम डरावना लगने लगा।
उसने सबसे साफ़ कोने में चटाई बिछाई
और लेट गई।
शरीर टूट चुका था,
मगर दिल में कुछ और था —
उम्मीद।
विडंबना है, है ना?
आशा नाम की औरत
फिर से आशा पा रही थी।
“कल सब बेहतर होगा,”
उसने बुदबुदाया
और सो गई।
उसे जो जगाया,
वह कोई आवाज़ नहीं थी —
बल्कि एक एहसास था।
यह एहसास कि
कमरे में कुछ ऐसा है
जो वहाँ नहीं होना चाहिए।
उसने आँखें खोलीं।
पूरा चाँद खिड़की से झाँक रहा था,
कमरे को ठंडी, चाँदी जैसी रोशनी में नहला रहा था।
और तभी उसने देखा।
दीवार पर कुछ हिल रहा था।
पहले उसे लगा
यह सपना होगा,
मगर नहीं।
एक काली रेखा
धीरे-धीरे मिट्टी की दीवार पर सरक रही थी।
उसका दिल ज़ोर से धड़क उठा।
एक साँप।
मोटा, उसके हाथ जितना लंबा,
दीवार पर ऐसे रेंग रहा था
जैसे यह सबसे सामान्य बात हो।
आशा पत्थर की तरह जड़ हो गई।
साँस लेने की भी हिम्मत नहीं हुई।
साँप दरार में घुसकर गायब हो गया।
“हे भगवान,”
उसने फुसफुसाया।
“बस एक साँप है।
गाँव में साँप होते हैं।
यह सामान्य है।”
वह खुद को यही समझाती रही।
थोड़ी देर बाद
थकान डर पर भारी पड़ गई
और वह फिर सो गई।
अगली सुबह
सूरज की पहली किरणों के साथ
वह जागी।
पहले पल उसे कुछ याद नहीं आया,
फिर सब लौट आया —
घर, सफ़ाई,
और वह साँप।
दिन की रोशनी में
सब कुछ कम डरावना लग रहा था।
“चलो आशा,”
उसने खुद से कहा,
“एक छोटे से साँप से डरोगी?”
वह बाहर निकली
और ज़मीन का मुआयना किया।
मिट्टी अच्छी थी —
लाल-भूरी और भुरभुरी।
कुछ जंगली पेड़ उगे थे।
पीछे एक पुराना कुआँ था,
पत्थर की मुंडेर पर काई जमी हुई।
उसने झाँका।
नीचे पानी था।
बूँदों की गूँज सुनाई दे रही थी।
यह अच्छा संकेत था।
दिन भर उसने ज़मीन साफ़ की,
बगिया की जगह तय की।
धूप तेज़ थी,
मगर उसे फर्क नहीं पड़ा।
यह सब उसका था।
रात को उसने मोमबत्ती जलाई
और फिर से रोटी-दाल खाई।
कल वह गाँव जाएगी,
कुछ सामान खरीदेगी,
बीज,
शायद एक-दो मुर्गियाँ।
वह फिर लेटी,
मगर नींद देर से आई।
खामोशी भारी थी,
जैसे घर साँस रोके खड़ा हो।
और तभी
एक हल्की-सी सरसराहट हुई —
जैसे कपड़ा कपड़े पर घिस रहा हो।
आशा उठ बैठी।
चाँद फिर कमरे को रोशन कर रहा था।
और इस बार
एक नहीं था।
तीन…
चार…
नहीं,
पाँच साँप।
दीवारों पर,
फ़र्श पर,
दरारों में आते-जाते —
जैसे वे ही इस जगह के मालिक हों।
चीख उसके गले में अटक गई।
वह उछलकर खड़ी हुई,
हर तरफ़ साँप थे।
एक चमकदार साँप
उसके पैर से कुछ ही इंच दूर सरक गया।
वह दरवाज़े की ओर दौड़ी।
हाथ काँप रहे थे,
कुंडी खोलना मुश्किल हो रहा था।
अंततः वह बाहर भागी —
नंगे पाँव,
रात के कपड़ों में।
सितारों के नीचे खड़ी,
तेज़ साँसें लेती हुई,
ठंडी हवा को महसूस करती हुई।
“यह सब क्या हो रहा है?”
भोर होने तक
वह अंदर जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाई।
सूरज निकलने पर
उसने झाँककर देखा।
कुछ भी नहीं था।
न साँप,
न निशान।
जैसे सब
एक बुरा सपना हो।
“शायद मैंने कल्पना की,”
उसने सोचा।
मगर दिल के किसी कोने में
वह जानती थी —
नहीं।
आशा जानती थी कि उसने वही देखा था जो उसने देखा था।
उस सुबह, खेत में काम जारी रखने के बजाय,
वह वापस गाँव की ओर चल पड़ी।
उसे जवाब चाहिए थे।
वह चुई लाल, गाँव के सबसे पुराने दुकानदार,
को अपनी दुकान में दाल के बोरे सजाते हुए मिली।
“नमस्ते, चुई काका।”
“अरे, आशा बहन,”
उसने कहा,
“क्या हुआ? अपने खेत से ऊब गईं?”
आशा ने जबरन मुस्कान बनाई।
“नहीं, ऐसा नहीं है।
बस आपसे कुछ पूछना था।
आप तो सारी ज़िंदगी यहीं रहे हैं…
क्या आपको उस खेत के बारे में कुछ पता है
जो मैंने मोहनलाल से खरीदा है?”
चुई लाल ने बोरे रखना बंद कर दिया।
उसने उसे एक ऐसी नज़र से देखा
जिसे आशा समझ नहीं पाई।
“वह…
दलदलों वाला खेत?”
“हाँ, वही।”
बूढ़े ने गहरी साँस ली
और सिर खुजलाते हुए टोपी उतार ली।
“बैठ जाइए, बहन।”
यह सुनकर ही आशा का दिल बैठ गया।
वह काउंटर के पास रखी लकड़ी की बेंच पर बैठ गई।
“देखिए,”
चुई लाल ने धीमे स्वर में कहा,
“मैं अफ़वाहों पर भरोसा नहीं करता,
लेकिन उस खेत का इतिहास है।”
“कैसा इतिहास?”
“जब मोहनलाल और उनकी पत्नी कुसुम देवी वहाँ रहते थे,
सब कुछ ठीक था।
खेती थी, मवेशी थे,
शांत जीवन था।”
“लेकिन कुसुम देवी की मौत के बाद…
अजीब चीज़ें होने लगीं।”
वह आगे झुका,
आवाज़ और धीमी कर दी,
जैसे कोई सुन न ले।
“साँप।
बहुत सारे साँप।”
“पहले एक-दो थे,
फिर धीरे-धीरे बढ़ते गए।
एक रात तो हाल यह था
कि मोहनलाल
बिना साँपों को कुचले
चल भी नहीं सकता था।”
“वह उसी रात भाग गया।
फिर कभी लौटकर नहीं आया।”
आशा को लगा
जैसे उसके पैरों से ज़मीन खिसक गई हो।
“क्यों?
वे कहाँ से आते थे?”
“किसी को नहीं पता।
कुछ कहते हैं कि खेत
पुराने नागों के बसेरे पर बना है।
कुछ कहते हैं कि कुएँ में कुछ ऐसा है
जो उन्हें बुलाता है।”
“पर एक बात तय है,”
चुई लाल ने कहा,
“मोहनलाल पहला नहीं था।
उससे पहले भी तीन परिवार आए…
और सब इसी वजह से चले गए।”
“तो फिर मुझे क्यों नहीं बताया गया?”
आशा की आवाज़ काँप रही थी।
“मोहनलाल ने मुझे क्यों बेचा?”
चुई लाल ने कंधे उचका दिए।
“शायद उसे लगा
यही मौका है
उस बोझ से छुटकारा पाने का।”
“और माफ़ करना बहन,”
उसने धीरे से जोड़ा,
“आप इतनी बेताब थीं
कि कुछ अपना हो,
कि आपने सही सवाल नहीं पूछे।”
आशा चुप रही।
वह जानती थी —
वह सही कह रहा था।
“अब मैं क्या करूँ?”
उसने बहुत धीमी आवाज़ में पूछा।
“मैं तो कहूँगा
वापस गाँव आ जाइए,”
चुई लाल बोला।
“लेकिन मैं आपको जानता हूँ।
आप ज़िद्दी हैं।”
“इसलिए बस इतना कहूँगा —
सावधान रहिए।
और अगर हालात बिगड़ें,
तो केवल गर्व के कारण
मत रुकीए।”
आशा दुकान से बाहर निकली।
उसका मन उथल-पुथल था।
वह बिना दिशा के
गाँव की गलियों में चलती रही।
वह जा सकती थी।
10 रुपये को खोया हुआ मान सकती थी।
फिर किसी किराए के कमरे में लौट सकती थी।
फिर वही गरीब विधवा…
या वह रह सकती थी।
इसका सामना कर सकती थी।
“वे सिर्फ़ साँप हैं,”
उसने खुद से कहा।
“जानवरों को भगाया जा सकता है।”
उसी शाम
उसने अपने आख़िरी पैसे से
चूना,
सल्फ़ेट
और एक नया मछेटी खरीदा।
“अगर उन्हें लड़ाई चाहिए,
तो लड़ाई मिलेगी।”
वह खेत लौटी
जब सूरज अभी ऊँचा था।
पहले उसने
पूरा घर
चूने से घेर दिया।
फिर सल्फ़ेट मिलाकर
हर दरार,
कुआँ,
हर छेद भर दिया।
“अब देखती हूँ,”
उसने बुदबुदाया।
रात तक काम किया।
बाँहें दर्द से टूट रही थीं।
वह दरवाज़े पर बैठ गई,
मछेटी पास रखकर।
रात काली चादर की तरह उतर आई।
उसने बाहर आग जलाई
और सोने का इरादा नहीं किया।
घंटे बीतते गए।
आधी रात…
एक…
दो…
और फिर
वह आवाज़ आई।
सरसराहट।
वह काँपते हाथों से मछेटी उठाकर खड़ी हुई।
जो उसने देखा
उसने उसे जमा दिया।
पाँच नहीं।
दस नहीं।
दर्जनों…
सैकड़ों।
दरारों से बहते हुए,
दीवारों पर,
छत पर,
जैसे जीवित नदी।
कोबरा,
धामन,
करैत,
अजगर —
बड़े, छोटे —
चाँदनी में
एक डरावना नृत्य।
मछेटी उसके हाथ से गिर गई।
वह हिल भी नहीं सकी।
बस देखती रही।
तभी
सबसे बड़ा नाग
दरवाज़े तक आया।
रुका।
सिर उठाया।
और उसे देखा।
सीधे आँखों में।
और उसी पल
कुछ बदल गया।
आशा को डर नहीं लगा।
उसे समझ आई।
एक मौन संवाद।
“यह…
तुम्हारा घर है,”
उसने फुसफुसाया।
नाग ने कुछ पल देखा,
फिर सिर झुकाया
और वापस भीतर चला गया।
आशा आग के पास गिर पड़ी।
आँसू बहने लगे।
डर के नहीं —
स्वीकृति के।
उसने 10 रुपये में खेत खरीदा था
क्योंकि
वह पहले से किसी का था।
ऐसे मालिकों का
जो इंसानों से पहले आए थे।
सुबह तक
वह बैठी रही।
साँप आते-जाते रहे
जैसे नदी का पानी।
सूरज निकलते ही
सब गायब हो गए।
आशा ने आख़िरी बार
घर में कदम रखा।
अपनी चटाई,
थैला,
देवी की तस्वीर उठाई,
आग बुझाई
और दरवाज़ा बंद कर दिया।
वह बिना पीछे देखे
गाँव लौट गई।
उसके दिल में
न ग़ुस्सा था
न पछतावा।
सिर्फ़ शांति।
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