अयोध्या बस अड्डे की ठंडी, धूल भरी सुबह थी। लोगों की आवाज़ें, रिक्शों की खड़खड़ाहट, चाय की उबलती केतली की सीटी—इन सब शोर के बीच, एक दुबला-पतला बारह साल का लड़का स्टील के गिलासों से भरी टोकरी उठाए तेज़-तेज़ कदमों से दौड़ रहा था।
“पवन! ज़रा जल्दी कर रे, ग्राहक इंतज़ार कर रहे हैं,” ढाबे के मालिक हरिप्रसाद ने रसोई से आवाज़ लगाई।
“आया काका!” पवन ने हांफते हुए जवाब दिया, “ये आख़िरी गिलास रख दूं, फिर बर्तन धोने बैठ जाता हूं।”
पवन, जिसने खुद को इसी बस अड्डे का हिस्सा मान लिया था। मां-बाप की मौत एक सड़क दुर्घटना में हो गई थी। कुछ महीने चाचा के यहां रहा, पर चाची की खरी-खोटी, गालियां और मार ने उसे एक रात चुपचाप घर से भागने पर मजबूर कर दिया। अब बस अड्डा ही उसका घर था, और ढाबा उसकी रोज़ी-रोटी।

दोपहर का वक्त था। ढाबे के पीछे लगे हैंडपंप पर पवन झुककर बर्तन धो रहा था। हाथों पर साबुन की झाग, चेहरे पर पसीना, और आंखों में अजीब-सी थकान।
हरिप्रसाद बाहर आया,
“पवन, खाना खा ले पहले, फिर काम कर लेना।”
पवन ने मुस्कुराकर कहा, “काका, पहले बर्तन निपटा लूं, नहीं तो लोग फिर डांटेंगे। आप थाली रख दो, मैं यहीं खा लूंगा।”
हरिप्रसाद ने स्नेह से उसे देखा,
“बाबू, तू खुद को बहुत झोंक देता है काम में… कभी थकान नहीं लगती?”
“लगती है काका,” पवन ने थाली हाथ में लेते हुए कहा, “पर जब याद आता है कि अब मेरा कोई नहीं… तो लगता है बस काम ही मेरा अपना है।”
हरिप्रसाद शांत हो गया। पवन की बात उसके दिल में उतर गई, मगर वो जानता था कि इस बच्चे के घावों पर शब्दों से ज्यादा वक्त का मरहम काम करेगा।
बस अड्डे से थोड़ी दूर, सड़क के मोड़ पर एक पुराना-सा हनुमान मंदिर था। लाल-संतरी झंडे, घंटियों की हल्की-सी आवाज़, और हमेशा जलता हुआ एक दीपक। यह वही मंदिर था जहां पवन के पापा उसे हर मंगलवार को लाते थे।
मंगलवार की शाम, काम थोड़ी देर से खत्म हुआ। पवन ने जेब टटोली। इस हफ्ते हर दिन के पचास रुपये में से कुछ बचाकर उसने सौ रुपये अलग रखे थे।
वह खुद से बुदबुदाया,
“आज हनुमान जी को हलवा नहीं, पर गुड़-चना का प्रसाद तो ज़रूर खिलाना है।”
मंदिर के बाहर वाली दुकान से उसने थोड़ा गुड़, भुने चने और कुछ पूरियां खरीदीं। मंदिर के फर्श पर बैठकर हनुमान चालीसा पढ़ने लगा, आवाज़ धीमी, लेकिन दिल से।
पढ़ते-पढ़ते उसकी आंखें भीग गईं। आख़िर में हाथ जोड़कर बोला,
“हनुमान जी, याद है न? पापा हर मंगलवार यहां आते थे। अब वो नहीं हैं… पर मैं हूं। आप ही मेरे पिता जैसे हो अब। मैं बड़ा हो कर अपना ढाबा खोलूंगा, और उस पर आपका नाम लिखूंगा। बस, मेरा हाथ मत छोड़ना।”
ऐसा कहते-कहते उसके होठ कांप गए। उसने आंख पोंछी, और बाहर निकलकर आने-जाने वालों में प्रसाद बांटने लगा।
एक बुज़ुर्ग रिक्शेवाला बोला,
“बेटा, तू हर मंगलवार यहीं होता है?”
पवन मुस्कुराया,
“हां चाचा, हनुमान जी से मिलने तो आना ही पड़ता है न।”
“और ये प्रसाद?”
“ये तो बस… इनके नाम पर छोटी-सी सेवा है,” उसने आहिस्ता से कहा।
जब आख़िरी पूड़ी भी बंट गई, पवन ने मंदिर की सीढ़ियों पर बैठकर आसमान की तरफ देखा,
“जब मैं इन्हें खिलाता हूं न, हनुमान जी, तो लगता है जैसे आप खुद खा रहे हो।”
चार साल बीत गए। पवन अब सोलह साल का हो चुका था। पहले दुबला-पतला, सहमा हुआ बच्चा, अब थोड़ा मजबूत हो गया था। ढाबे पर उसका काम भी बदल गया था।
हरिप्रसाद काका ने एक दिन कहा,
“पवन, ज़रा देख, आज तू दाल में तड़का लगा ले, मैं ज़रा बाज़ार तक हो आऊं।”
पवन घबरा गया,
“मैं? काका, अगर गड़बड़ हो गई तो?”
हरिप्रसाद हंस पड़ा,
“अरे पगले, तू चार साल से दिन-रात मेरी रसोई देख रहा है। तड़का नहीं लगा पाएगा क्या? कर, मैं यहीं हूं, चिंता मत कर।”
पवन ने पहली बार चूल्हे के सामने खड़ा होकर खुद तड़का लगाया। घी गरम हुआ, जीरा चटका, लहसुन की खुशबू फैली। उसका दिल तेज़ धड़क रहा था।
ढाबे पर बैठे एक ग्राहक ने दाल चखी और बोला,
“अरे हरिप्रसाद! आज दाल में कुछ अलग ही स्वाद है।”
हरिप्रसाद मुस्कुराया,
“आज मेरे शागिर्द के हाथ की दाल है भाई, पवन ने बनाई है।”
ग्राहक ने पवन को देखा,
“अच्छा? बेटा, नाम क्या बताया तुमने?”
“जी… पवन।”
“शाबाश, मेहनत करते रहो, कल को बड़ा कुक बनेगा।”
उस दिन के बाद से पवन अब सिर्फ बर्तन नहीं धोता था, बल्कि सब्जी काटने से लेकर रोटी बेलने और कई पकवान बनाने तक में हाथ बटाने लगा। ग्राहकों को जब भी उसका बनाया खाना मिलता, वे तारीफ किए बिना नहीं रहते।
रात को मंदिर में बैठा, उसने धीरे से कहा,
“देखा हनुमान जी? अब मैं खाना भी बना लेता हूं। एक दिन अपना होटल भी संभाल लूंगा, ये वादा है।”
अब हरिप्रसाद उसे रोज़ 200 रुपये देने लगा था। खाने-पीने, सोने की चिंता तो ढाबे पर ही दूर हो जाती थी, तो उसके लिए ये पैसा बहुत था।
पवन ने सोचा,
“अब तो मैं हर हफ्ते , हर मंगलवार को ढंग से प्रसाद चढ़ा सकता हूं।”
उसने हर मंगलवार हनुमान जी के लिए हलवा-पूरी का प्रसाद बनाना शुरू किया। सुबह ढाबे पर काम ख़त्म कर, दोपहर में थाली सजाता, बड़े भगोने में सूजी का हलवा बनाता, और सैकड़ों पूरियां तलता।
जब मंदिर के बाहर प्रसाद वितरण शुरू होता, लोग खुद-ब-खुद जुट जाते—
रिक्शेवाले, मज़दूर, बस ड्राइवर, कंडक्टर, यात्री, आसपास के गरीब बच्चे…
एक दिन एक बच्चा बोला,
“भैया, तुम पैसे क्यों यूं ही खर्च कर देते हो? बचा लो, काम आएंगे।”
पवन मुस्कुराया,
“ये पैसे मैं कहां खर्च कर रहा हूं? ये तो सीधे हनुमान जी के यहां जमा हो रहे हैं।”
पास ही खड़ी एक बुज़ुर्ग मां ने कहा,
“बेटा, भगवान सब देखते हैं। तू भूखों को खिलाता है, एक दिन तुझे भी बहुत खिलाएगा ऊपरवाला।”
पवन के गले में कुछ अटक-सा गया। उसने बस हाथ जोड़कर कहा,
“आप सब खा लीजिए, बस मेरे लिए दुआ कर दीजिए।
एक मंगलवार की ही बात थी। शहर के जाने-माने बड़े होटल “कनक महल” के मालिक, गिरधारी लाल जी, बस से इलाहाबाद जाने वाले थे। उम्र लगभग पचपन-साठ, पर चाल-ढाल में अब भी रौब था। सफेद कुर्ता-पाजामा, कंधे पर अंगोछा।
बस अचानक बीच रास्ते में खराब हो गई। ड्राइवर ने कहा,
“सेठ जी, कम से कम एक घंटा तो लग ही जाएगा।”
गिरधारी लाल ने झुंझलाकर कहा,
“अरे, ये भी आज ही होना था?… खैर, सुना है पास में हनुमान मंदिर है, चलो दर्शन कर आते हैं।”
जब वो मंदिर के आंगन में पहुंचे, तो देखा कि एक जवान लड़का बड़े प्रेम से हलवा-पूरी का प्रसाद बांट रहा है। लोग लाइन में लगे थे, और वह हर किसी को मुस्कुराकर प्रसाद दे रहा था।
गिरधारी लाल ने सोचा,
“चलो, भगवान का प्रसाद ही सही, पेट में भी कुछ चला जाएगा।”
उन्होंने प्लेट आगे बढ़ाई। पवन ने झुककर थाली रखी,
“लिए बाबूजी, हनुमान जी का प्रसाद है।”
गिरधारी लाल ने पहला कौर मुंह में रखा… जैसे ही हलवे का स्वाद जीभ पर पहुंचा, वो ठिठक से गए।
उन्होंने मन ही मन सोचा,
“ये… ये स्वाद? इतना सधा हुआ, इतना घर जैसा, और फिर भी होटल जैसा परफेक्ट! ऐसा हलवा तो मेरे शेफ भी नहीं बना पाते।”
उन्होंने थाली खत्म की, फिर लाइन तोड़कर सीधे पवन के पास गए,
“बेटा, ये हलवा किसने बनाया है?”
पवन ने हल्की शर्म के साथ कहा,
“जी, मैंने। अपने हाथ से बनाया है।”
“तू क्या करता है?”
“यहीं बस अड्डे पर हरिप्रसाद काका के ढाबे में काम करता हूं। बर्तन धोना, सब्जी काटना, खाना भी बना लेता हूं।”
“और ये प्रसाद? अपने खर्चे से करता है?”
“जी,” पवन ने हिचकते हुए कहा, “हर मंगलवार को जो भी पैसे बचते हैं, उससे ये हलवा-पूरी बना कर बांट देता हूं। लगता है जैसे हनुमान जी खुद खा रहे हों।”
गिरधारी लाल कुछ पल उसे देखते रहे। इतने कम उम्र में इतनी श्रद्धा, इतनी निस्वार्थ सेवा… उनका दिल पिघल गया।
“तेरा नाम क्या है बेटा?”
“पवन।”
“कभी बड़ा होटल में काम करने का सोचा है?”
पवन चौंक गया,
“बड़ा होटल? नहीं सेठ जी… वहां कौन रखेगा मुझे? न डिग्री, न पढ़ाई…”
गिरधारी लाल मुस्कुराए,
“भैया, खाने का स्वाद डिग्री से नहीं, दिल से आता है। कल सुबह मेरे होटल ‘कनक महल’ पर आना। पूछ लेना, मालिक गिरधारी लाल से मिलना है। अगर सच में सीखना चाहता है, तो मैं तुझे मौका दूंगा।”
पवन की आंखों में आशा और डर दोनों तैर गए,
“सच कह रहे हैं आप? मज़ाक तो नहीं?”
“भगवान के घर से निकलकर मज़ाक नहीं किया जाता बेटा,” गिरधारी लाल ने उसके कंधे पर हाथ रखकर कहा, “आएगा न?”
पवन ने अनायास ही मंदिर की तरफ देखा,
“अगर हनुमान जी चाहेंगे तो ज़रूर आउंगा, सेठ जी।”
उस रात पवन नींद नहीं ले पाया। बस अड्डे के कोने में अपनी चादर ओढ़कर लेटा, पर आंखें खुली ही रहीं। उसने आसमान की तरफ देखा,
“हनुमान जी, ये वही मौका है क्या, जिसके लिए मैं इतने साल से चालीसा पढ़ रहा था? अगर ये आपका इशारा है, तो मुझे शर्मिंदा मत होने देना।”
सुबह होते ही उसने हरिप्रसाद काका को सब कुछ बता दिया।
हरिप्रसाद पहले तो चौंके, फिर आंखें नम हो गईं,
“देख पवन, दिल तो नहीं मान रहा तू यहां से जाए, पर अगर तेरा भला इसी में है, तो मैं कैसे रोकूं? तू मेरा बेटा जैसा है। जा, इतने सालों की मेहनत का फल है ये।”
पवन ने उनके पैर छू लिए,
“काका, अगर कभी… कभी आपको लगे कि मैंने आपको भूल गया, तो बस हनुमान जी से शिकायत कर देना।”
“जा पगले,” हरिप्रसाद ने सिर पर हाथ रखते हुए कहा, “भगवान तेरा भला करे।”
अगले दिन पवन “कनक महल” होटल के सामने खड़ा था। चमकती हुई कांच की दीवारें, यूनिफॉर्म में स्टाफ, अंदर की रौनक देखकर वो घबरा गया।
“ये… ये दुनिया तो बिल्कुल अलग है,” उसने सोचा।
अंदर रिसेप्शन पर खड़े मैनेजर ने उसे शक से देखा,
“किससे मिलना है?”
“जी, गिरधारी लाल सेठ से… उन्होंने खुद बुलाया था। मेरा नाम पवन है।”
थोड़ी देर बाद गिरधारी लाल खुद बाहर आए,
“अरे, आ गया तू! चल, अंदर चल, तुझे रसोई दिखाता हूं।”
किचन में बड़े-बड़े बर्नर, स्टील के बर्तन, कई तरह के मसाले, शेफ की यूनिफॉर्म में कुक—सब कुछ पवन के लिए अनजाना, फिर भी आकर्षक था।
गिरधारी लाल ने शेफ से कहा,
“देखो, ये पवन है। आज से ये तुम्हारे साथ काम करेगा। पहले सब्जी काटना, मसाले पीसना, छोटी-मोटी मदद… पर ध्यान रखना, इसे सिखाना है, सिर्फ़ काम लेना नहीं।”
फिर पवन की तरफ मुड़े,
“तू यहां ही रहेगा। ऊपर स्टाफ क्वार्टर में तेरे सोने का इंतज़ाम है। खाने-पीने की चिंता मत करना। बस मन लगाकर सीख।”
पवन की आंखें भर आईं,
“सेठ जी… आपने तो मेरा घर दे दिया मुझे।”
गिरधारी लाल ने हल्के से मुस्कुराकर कहा,
“घर बनाने वाला तू खुद है बेटा। मैंने सिर्फ दरवाज़ा खोला है।”
दिन, हफ्ते, महीने बीतते गए। पवन सुबह सबसे पहले किचन पहुंच जाता, सब्जियां धोता, काटता, मसाले तैयार करता। शेफ की हर छोटी-बड़ी बात पर ध्यान देता। कब तेल गरम करना है, कब आंच धीमी रखनी है, कौन-सी डिश में कितना नमक, कितना मसाला।
एक दिन शेफ ने चिढ़कर कहा,
“पवन, तू इतना टकटकी लगाकर क्यों देखता रहता है? काम कर, काम!”
पवन मुस्कुराकर बोला,
“काम भी कर रहा हूं मास्टरजी, और सीख भी रहा हूं। एक दिन मैं भी आपके जैसा बनना चाहता हूं।”
शेफ ने अनमने ढंग से कहा,
“अच्छा-अच्छा, देख लेंगे।”
धीरे-धीरे, पवन के हाथ का बना खाना भी मेन्यू में जगह लेने लगा। पहले उसे स्टाफ के लिए खाना बनाने को कहा गया। फिर एक दिन अचानक एक वेटर भागता हुआ किचन में आया,
“मास्टरजी, बाहर एक ग्राहक घर जैसा हलवा मांग रहे हैं, कम मीठा और देसी घी वाला। आप बनाओगे ?”
शेफ किसी और काम में व्यस्त था, चिढ़कर बोला,
“अरे, अभी इतना ऑर्डर है, हलवे के लिए टाइम नहीं है। पवन, तू बना ले, जैसा बनाता था न मंदिर के लिए।”
पवन के हाथ एक क्षण को रुक गए,
“सच में बना दूं, मास्टरजी?”
“हां-हां, जल्दी कर, वरना सेठ डांटेंगे।”
पवन ने गहरी सांस ली,
“हनुमान जी, यहां भी इम्तिहान शुरू हो गया लगता है।”
उसने ठीक वैसे ही हलवा बनाया, जैसे मंदिर के लिए बनाता था। थोड़ा कम मीठा, घी की खुशबू, सूजी का सही भूनाव।
जब हलवा टेबल पर पहुंचा, कुछ देर बाद वेटर दौड़ता हुआ वापस आया,
“सेठ जी ने बुलाया है!”
पवन का दिल ज़ोर से धड़कने लगा,
“लगता है गड़बड़ हो गई…”
वो घबराया हुआ गिरधारी लाल के केबिन में पहुंचा। गिरधारी लाल की मेज़ पर वही हलवा रखा था, आधा खाया हुआ।
“ये किसने बनाया?”
पवन ने सिर झुकाकर कहा,
“जी… मैंने।”
गिरधारी लाल ने हल्के से मुस्कुराते हुए कहा,
“आज से ये ‘हनुमान प्रसाद हलवा’ के नाम से हमारे मेन्यू में रहेगा। और इसे सिर्फ तू ही बनाएगा।”
पवन की आंखें चमक उठीं,
“सच में, सेठ जी?”
“हां बेटा, तूने आज मेरे होटल को नया स्वाद दिया है।”
कितनी भी रौनक, कितने भी बड़े ग्राहक क्यों न आ जाएं, पवन की एक चीज़ कभी नहीं बदली—उसका मंगलवार।
हर मंगलवार की शाम, वो होटल के काम के बाद सीधे उसी हनुमान मंदिर पहुंचता। अब उसकी आमदनी भी अच्छी थी, तो वो और ज़्यादा हलवा-पूरी बनवाकर या खुद बनाकर ले जाता, और मंदिर के बाहर खड़े होकर प्रसाद बांटता।
होटल के कुछ स्टाफ भी धीरे-धीरे उसके साथ लगने लगे,
“पवन भाई, आज हम भी मदद करेंगे।”
एक दिन होटल के मैनेजर ने पूछा,
“पवन, तू हफ्ते भर की मेहनत का इतना हिस्सा यूं ही बांट देता है, कभी सोचा नहीं कि भविष्य के लिए बचा ले?”
पवन ने शांत स्वर में जवाब दिया,
“सर, जब मैं यहां नहीं था, तब भी मैंने हनुमान जी के भरोसे ही रोटी खाई है। आज अगर मेरे पास ज़्यादा है, तो ये भी उन्हीं का दिया है। ये भविष्य भी तो वही हैं न?”
मैनेजर कुछ बोल न सका। उसके भीतर भी पवन के लिए सम्मान और बढ़ गया।
समय उड़ता गया। पवन अब चौबीस साल का हो चुका था। उसका नाम अब सिर्फ किचन तक सीमित नहीं था। शहर में लोग कहते,
“कनक महल जाओ, वहां का ‘हनुमान प्रसाद हलवा’ और स्पेशल थाली ज़रूर खाना।”
उस दिन दोपहर को गिरधारी लाल ने उसे केबिन में बुलाया। चेहरा कुछ थका-थका, मगर आंखों में अपनापन।
“बैठ पवन,” उन्होंने कुर्सी की तरफ इशारा किया।
“जी सेठ जी,” पवन संकोच से बैठ गया, “कोई गलती हो गई क्या?”
“अरे नहीं,” गिरधारी लाल हल्के से हंसे, “हर बात गलती से ही जोड़ी है तेरे दिमाग में? कभी अच्छी बात के लिए भी बुला सकता हूं क्या नहीं?”
पवन थोड़ा सहज हुआ,
“जी… कहिए सेठ जी।”
गिरधारी लाल ने धीरे-धीरे कहा,
“पवन, मेरी उम्र अब काफी हो चली है। शरीर भी पहले जैसा साथ नहीं देता। मेरा बेटा अमेरिका में बस चुका है, उसने साफ़ कह दिया है कि उसे होटल संभालने में दिलचस्पी नहीं। मैं सोच रहा हूं कि ये होटल आगे किसके हवाले करूं।”
पवन के चेहरे पर चिंता आ गई,
“सेठ जी, अगर आप होटल बेच देंगे, तो… तो हम सब का क्या होगा? हम तो…”
गिरधारी लाल ने उसकी बात काट दी,
“बस, यहीं गलती करता है तू। तू खुद को आज तक सिर्फ ‘कर्मचारी’ समझता रहा, जबकि तू तो इस होटल की रूह बन चुका है।”
उन्होंने दराज़ से कुछ कागज़ निकाले,
“ये देख, ये पार्टनरशिप के पेपर हैं। मैं चाहता हूं कि अब से ‘कनक महल’ तू संभाले। मुनाफा जो भी होगा, आधा मेरा, आधा तेरा। आगे चलकर, मेरी उम्र और बढ़ेगी, तो ये हिस्सा भी तुझे ही सौंप दूंगा।”
पवन का गला भर आया,
“सेठ जी… मैं? मैं तो अनाथ हूं… मेरे पास तो…”
गिरधारी लाल ने सख्ती से कहा,
“फिर से ये शब्द मत कहना। अनाथ वो होता है, जो खुद को अकेला मान ले। तू तो हनुमान जी का बच्चा है, और ऊपर से… मेरा भी बेटा जैसा है।”
पवन की आंखों से आंसू ढुलक पड़े,
“सेठ जी, मैं आपकी इस कृपा के लायक नहीं हूं।”
“तेरी मेहनत, तेरी ईमानदारी, तेरी आस्था… इन सबसे तू बहुत लायक है, पवन,” गिरधारी लाल ने कहा, “पर मेरी एक शर्त है।”
पवन ने चौंककर पूछा,
“शर्त?”
“हां, शर्त,” उन्होंने मुस्कुराकर कहा, “तू ये होटल अपने तरीके से चलाएगा, पर भगवान को भूलकर नहीं। जैसा तू अभी करता है—मंगलवार को प्रसाद बांटना, भूखों को खिलाना—ये सब कभी बंद नहीं होना चाहिए।”
पवन ने बिना सोचे कहा,
“अगर ये शर्त है, तो ये तो मेरा सौभाग्य है सेठ जी। पर मेरी भी एक विनती है।”
“कहो बेटा।”
“मैं चाहता हूं कि होटल का नाम बदलकर हनुमान जी के नाम पर रखा जाए। और होटल के बाहर एक छोटा-सा हनुमान मंदिर भी बनाया जाए। ताकि जो भी यहां आए, उसे पता चले कि ये होटल किसकी कृपा से चल रहा है।”
गिरधारी लाल कुछ पल उसे देखते रहे, फिर धीरे-धीरे सिर हिलाया,
“आज समझ आया कि भगवान ने मुझे तुझसे क्यों मिलवाया था। ठीक है, जैसा तू कहेगा वैसा ही होगा।”
कुछ ही महीनों में होटल के बाहर नया बोर्ड लग गया—
“हनुमान प्रसाद भोजनालय
पूर्व में ‘कनक महल’
मालिक: गिरधारी लाल एवं पवन (साझेदार)”
गेट के बगल में एक सुंदर-सा हनुमान मंदिर बना। लाल झंडे, घंटी, साफ-सुथरा आंगन। हर सुबह पवन खुद फूल चढ़ाता, दीपक जलाता, और हाथ जोड़कर कहता,
“जो भी यहां आए, हनुमान जी, उसे भूखा मत जाने देना, चाहे पैसे हों या न हों।”
होटल के नए नियम बने—
– हर मंगलवार को हलवा-पूरी का प्रसाद सभी ग्राहकों को मुफ्त।
– जो सच में भूखा हो और पैसे न हों, उसके लिए रसोई हमेशा खुली।
– किचन में कोई भी डिश बनती, तो पहला निवाला मानसिक रूप से भगवान को अर्पित मानकर ही परोसा जाता।
शहर में चर्चा होने लगी,
“अरे, हनुमान प्रसाद भोजनालय चले हो? वहां का मालिक खुद प्रसाद बांटता है।”
एक दिन हरिप्रसाद काका भी बस पकड़ने शहर आए। होटल के बाहर लगा बोर्ड देखकर ठिठक गए।
“ये… ये नाम तो,” उन्होंने सोचा, “कहीं ये मेरा वही पवन तो नहीं?”
अंदर पहुंचे, तो देखा एक नौजवान, साफ़ कपड़ों में, लेकिन आंखों में वही पुरानी चमक, खुद ग्राहकों को देख रहा था, कभी किचन में जा रहा है, कभी किसी गरीब को थाली पकड़ा रहा है।
“पवन!” हरिप्रसाद के मुंह से अनायास निकल गया।
पवन मुड़ा, और जैसे ही उसने हरिप्रसाद को देखा, भागकर उनके पैर गिर पड़ा,
“काका! आप… आप यहां कैसे?”
हरिप्रसाद की आंखों से भी आंसू बह निकले,
“तू सच में मालिक बन गया रे… और नाम भी भगवान के ही रखा।”
पवन ने भावुक होकर कहा,
“काका, अगर आपने उस दिन मुझे दाल का तड़का न लगाने दिया होता, तो शायद आज मैं यहां खड़ा नहीं होता। आप मेरे लिए पिता जैसे हैं, और हनुमान जी मेरे असली मालिक।”
गिरधारी लाल भी वहां आ गए। दोनों बुजुर्गों ने एक-दूसरे को देखा, और मुस्कुराकर सिर हिलाया—जैसे कह रहे हों, “ये लड़का सच में भगवान का दिया है।”
समय और आगे बढ़ा। हनुमान प्रसाद भोजनालय अब सिर्फ एक होटल नहीं, एक प्रतीक बन गया था—सेवा, आस्था और मेहनत का।
एक शाम, मंदिर के बाहर बैठे गिरधारी लाल ने पवन को बुलाया,
“पवन, एक ज़रूरी बात करनी है।”
“जी सेठ जी?”
“अब तू जवान हो गया है। होटल भी संभाल रहा है। मैंने सोचा… तेरी शादी की बात आगे बढ़ाई जाए।”
पवन थोड़ा सकपका गया,
“शादी? सेठ जी, मैं तो… मेरे पास तो परिवार भी नहीं है, कौन देगा अपनी बेटी मुझे?”
गिरधारी लाल ने गहरी सांस ली,
“परिवार नहीं है तो क्या? अब तू ही मेरा परिवार है। मेरी एक बेटी है—नंदिनी। वह अभी पढ़ाई कर रही थी। कुछ दिन पहले ही वापस आई है।”
पवन ने सिर उठाकर उनकी आंखों में देखा,
“सेठ जी… आप क्या कहना चाहते हैं?”
“अगर तुझे कोई एतराज़ न हो, और नंदिनी भी राज़ी हो, तो… मैं चाहता हूं, तू मेरा दामाद नहीं, बेटा बनकर इस घर और होटल दोनों को संभाले,” गिरधारी लाल की आवाज़ भर्रा गई, “तूने मेरे होटल की इज़्ज़त बढ़ाई है, अब अगर मेरी बेटी की ज़िंदगी भी तेरे हाथ में सौंप दूं, तो गलत नहीं करूंगा।”पवन की आंखों से आंसू बह निकले।
“सेठ जी… मैं तो अनाथ हूं… मेरी क्या औकात कि मैं आपकी बेटी से…”अचानक मंदिर की घंटी ज़ोर से बजी। हवा का झोंका आया, जैसे कोई अदृश्य हाथ पवन के सिर पर आशीर्वाद दे रहा हो।गिरधारी लाल ने उसका हाथ थामकर कहा,
“औकात इंसान की नहीं, उसके कर्म की होती है, पवन। और तेरे कर्मों ने तुझे बहुत ऊंचा बना दिया है।”
कुछ ही दिनों बाद, घर में सबके सामने नंदिनी से पवन की मुलाकात हुई। नंदिनी ने मुस्कुराकर कहा,
“पापा ने आपके बारे में बहुत बताया है। जो इंसान खुद भूखे रहकर भी दूसरों को खिलाता है, उसके साथ ज़िंदगी बिताने में मुझे कोई डर नहीं लगता।”पवन ने झिझकते हुए कहा,
“पर… आपको नहीं लगेगा कि आपने एक ढाबे वाले लड़के से…?”नंदिनी ने तुरंत जवाब दिया,
“मुझे सिर्फ ये लगता है कि मैंने एक सच्चे इंसान को चुना है, जिसके दिल में भगवान और गरीब दोनों के लिए जगह है। बाक़ी सब ऊपरवाला देख लेगा।”
हनुमान जी की छत्रछाया में वक्त बीता, और अयोध्या के उसी हनुमान मंदिर के सामने, उसी बस अड्डे से कुछ ही दूरी पर, एक दिन बारात निकली। ढोल-नगाड़े बज रहे थे, फूल बरस रहे थे। बोर्ड पर लिखा था—
“श्री पवन एवं श्रीमती नंदिनी के विवाह की हार्दिक शुभकामनाएं – हनुमान प्रसाद भोजनालय परिवार।”मंदिर के आंगन में फेरे होने से पहले पवन अकेले कुछ पल के लिए मूर्ति के सामने खड़ा हुआ।
धीरे से बोला,
“हनुमान जी, जब मैं यहां पहली बार आया था, तब फटी हुई बनियान और गंदी चप्पल में एक अनाथ बच्चा था। आज उसी जगह से दूल्हा बनकर जा रहा हूं, सिर पर आपकी और अपने बड़ों की दुआ लेकर… अगर ये चमत्कार नहीं है, तो क्या है?”आंखों से आंसू बह निकले, मगर ये आंसू दर्द के नहीं, कृतज्ञता के थे।पीछे से आवाज़ आई,
“चलो पवन, पंडित जी बुला रहे हैं,” नंदिनी ने धीमी मुस्कान के साथ कहा।पवन ने पलटकर उसे देखा, फिर हाथ जोड़कर हनुमान जी से कहा,
“अब आप ही इस नए घर को भी संभालना, जैसे अब तक मुझे संभाला है।”फेरे हुए, मंत्र गूंजे, सबने ताली बजाई।
कुछ महीनों बाद, हनुमान प्रसाद भोजनालय के बाहर एक नया बोर्ड लगा—
“मालिक: पवन एवं नंदिनी (हनुमान जी के सेवक)
संस्थापक आशीर्वाद: गिरधारी लाल जी”
आज भी, हर मंगलवार, पवन और नंदिनी दोनों मिलकर मंदिर में हलवा-पूरी का प्रसाद बांटते हैं। कभी-कभी कोई अनाथ बच्चा लाइन में खड़ा दिख जाता है, तो पवन उसके सिर पर हाथ रखकर कहता,
“डर मत… तेरे लिए भी हनुमान जी ने कोई न कोई राह ज़रूर रखी है।”और दूर, मंदिर की ऊंची छत पर लहराता लाल झंडा जैसे गवाही देता है कि
जिसके सिर पर हनुमान जी का हाथ हो,
उसे दुनिया की कोई ताकत नहीं रोक सकती।
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न्यू दिल्ली टीचर ट्रेनिंग कॉलेज का एक्सेप्टेंस लेटर हाथ में लिए, मैं रो पड़ी क्योंकि मेरी फॉस्टर मां ने मुझे स्कूल छुड़वाकर गांव के 60 साल के मिस्टर शर्मा से शादी करने पर मजबूर किया, ताकि मेरे छोटे भाई को मेरठ में मेडिकल स्कूल में पढ़ने के लिए दहेज के पैसे मिल सकें। मेरी शादी के दिन, पूरे गांव ने मुझ पर उंगली उठाई और गॉसिप की, तरह-तरह की बुरी बातें कहीं। मेरी शादी की रात, मेरे पति अंदर आए और बिस्तर पर दो चीजें रख दीं जिससे मैं चुपचाप रो पड़ी…
जिस दिन मुझे एक्सेप्टेंस लेटर मिला, मैं रोई नहीं। मैं बस घर के पीछे कुएं के पास काफी देर तक…
इतने सालों तक तुम्हें पालने के बाद, अब समय आ गया है कि तुम अपनी माँ की मेहरबानी का बदला चुकाओ!/hi
न्यू दिल्ली टीचर ट्रेनिंग कॉलेज का एक्सेप्टेंस लेटर हाथ में लिए, मैं रो पड़ी क्योंकि मेरी फॉस्टर मां ने मुझे…
अपनी पत्नी को छोड़कर डायरेक्टर की बेटी से शादी करने की खुशी में मैं बहुत खुश था, लेकिन शादी की रात जब उसने अपनी ड्रेस उठाई तो मैं हैरान रह गया।/hi
अपनी पत्नी को छोड़कर डायरेक्टर की बेटी से शादी करने की खुशी में, मैं अपनी शादी की रात हैरान रह…
कंपनी में एक खूबसूरत शादीशुदा औरत को पटाने पर गर्व करते हुए, मैं आज सुबह उठा और जब मैंने अपनी तरफ देखा तो हैरान रह गया।/hi
काम की जगह पर एक खूबसूरत शादीशुदा औरत को जीतने पर गर्व महसूस करते हुए, मैं एक सुबह उठा और…
आधी रात को, मेरी हॉट पड़ोसन मेरे दरवाज़े पर दस्तक देकर अंदर आने के लिए कहने लगी, और जब मुझे उसकी हरकतों के पीछे का असली मकसद पता चला तो मैं हैरान रह गई…/hi
आधी रात को, मेरी हॉट पड़ोसन ने अंदर आने के लिए मेरा दरवाज़ा खटखटाया, और जब मुझे उसकी हरकतों के…
मेरे बेटे ने गांव वाला अपना घर बेच दिया, अपने माता-पिता की सारी सेविंग्स—4 करोड़ रुपये—इकट्ठी कीं और शहर में एक घर खरीदा। लेकिन फिर वह अपनी पत्नी के माता-पिता को अपने साथ रहने के लिए ले आया, जबकि वे मेरी पत्नी और मेरे साथ, जो गांव में रहते थे, ऐसा बर्ताव करते थे जैसे हमारा कोई वजूद ही न हो। गुस्से में, मैं बिना बताए डिनर के समय उनसे मिलने चला गया। मेरे बेटे ने जवाब दिया, “तुमने मुझे बताया क्यों नहीं कि तुम आ रही हो?” और उसके बाद मेरी बहू ने जो किया, उससे मैं हैरान रह गया।/hi
मेरे बेटे ने गांव में हमारा घर बेच दिया, अपने माता-पिता की सारी सेविंग्स—4 करोड़ रुपये—इकट्ठी कीं और शहर में…
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