हवाई अड्डे के भीतर हाथ में छोटा सा बैग खींचती हुई लक्ष्मी अम्मा हाँफ रही थीं। वह रियाद से आ रही थीं। पूरे दस साल। पूरे दस साल उन्होंने घरेलू सहायिका के रूप में काम किया था।
इन दस वर्षों में वह एक बार भी घर नहीं लौटीं।

“किराया बेकार जाएगा,” वह हमेशा खुद से कहती थीं। “वही पैसे रोहन की पढ़ाई के लिए भेज दूँगी।”

उन्हें अपने बेटे रोहन की याद आई। जब वह घर से निकली थीं, तब रोहन हाई स्कूल में था। आज वह पच्चीस साल का हो चुका था। माँ-बेटे की मुलाकात बस वीडियो कॉल पर होती थी। मोबाइल की स्क्रीन पर ही उन्होंने अपने बेटे को बड़ा होते देखा—स्कूल की ग्रेजुएशन से लेकर कॉलेज पूरा करने तक।

रोहन का सपना था: पायलट बनना।

एविएशन स्कूल बहुत महँगा था। लक्ष्मी अम्मा की पूरी तनख़्वाह भी कम पड़ जाती थी। उन्होंने ओवरटाइम किया, छुट्टी के दिनों में दूसरे घरों में कपड़े धोए, और कई बार सिर्फ नूडल्स खाकर गुज़ारा किया—बस रोहन की फ़ीस भेजने के लिए।

अब वह हमेशा के लिए लौट रही थीं। उम्र हो चली थी, पीठ में दर्द रहता था, और चेहरे पर झुर्रियाँ साफ़ दिखती थीं।

वह विमान में चढ़ीं। इकोनॉमी क्लास। भीड़-भाड़।

उन्होंने खिड़की के पास सीट 42A पर जगह ली और आँखें बंद कर लीं।

“धन्यवाद, भगवान,” उन्होंने फुसफुसाकर कहा। “थक गई हूँ, पर आखिरकार सब पूरा हुआ।”

तभी विमान के पीए सिस्टम से आवाज़ आई।

“नमस्कार देवियो और सज्जनो। मैं आपका कैप्टन बोल रहा हूँ। इंडियन एयरलाइंस की फ्लाइट AI 218 में आपका स्वागत है, जो दिल्ली जा रही है।”

लक्ष्मी अम्मा की आँखें खुल गईं। आवाज़ जानी-पहचानी लगी। दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा।

“आज की उड़ान शांत रहने की उम्मीद है। लेकिन टेक-ऑफ से पहले मैं एक खास घोषणा करना चाहता हूँ।”

कैप्टन की आवाज़ थोड़ी भर्राई हुई थी।

“आज हमारे साथ एक बहुत ही खास यात्री हैं। वह सीट 42A पर बैठी हैं।”

लक्ष्मी अम्मा की आँखें फैल गईं। 42A? वह तो वही सीट थी! आस-पास बैठे यात्री उनकी ओर देखने लगे।

“दस साल पहले, वह भारत छोड़कर विदेश गईं और वहाँ घरेलू सहायिका के रूप में काम किया। उन्होंने फर्श साफ़ किए, बर्तन धोए, और दूसरों के बच्चों की देखभाल की—ताकि मेरे एविएशन स्कूल की फीस भर सकें।”

लक्ष्मी अम्मा की आँखों से आँसू बहने लगे। उन्होंने अपना मुँह हाथ से ढक लिया।

“वह पूरे एक दशक तक घर नहीं लौटीं, क्योंकि वह मेरे सपने के लिए हर एक रुपया बचाना चाहती थीं। आज वह पहली बार घर लौट रही हैं। और आज ही मेरी पहली उड़ान है—कैप्टन के रूप में।”

कॉकपिट का दरवाज़ा खुला।

एक लंबा-सा युवक बाहर आया। पायलट की वर्दी में—सफेद शर्ट, काली टाई, और कंधों पर चार सुनहरी धारियाँ (कैप्टन की पहचान)।

वह धीरे-धीरे गलियारे से पीछे की ओर चलने लगा। सभी यात्री खड़े होकर देख रहे थे।

रो 42 पर पहुँचकर, कैप्टन रुक गया।

कैप्टन रोहन वहीं रो 42 पर आकर रुक गया। उसके सामने बैठी बूढ़ी और दुबली-सी औरत को देखते ही उसकी आँखें भर आईं। लक्ष्मी अम्मा का पूरा शरीर काँप रहा था। वह उठने की कोशिश करने लगीं, लेकिन घबराहट में फिर से सीट पर बैठ गईं। आसपास पूरा केबिन एकदम खामोश था। कोई खाँसने की भी हिम्मत नहीं कर रहा था।

“माँ…” रोहन की आवाज़ टूट गई।

सिर्फ एक शब्द। लेकिन उस एक शब्द में दस साल की दूरी, दर्द, त्याग और अधूरापन सब समा गया था।

लक्ष्मी अम्मा को जैसे यकीन ही नहीं हुआ। उन्होंने काँपते हाथों से अपना चेहरा छुआ, फिर सामने खड़े पायलट की वर्दी को देखा। वह बुदबुदाईं, “न… नहीं… यह सपना है… रोहन?”

रोहन घुटनों के बल ज़मीन पर बैठ गया। एक कैप्टन, जिसने कुछ देर पहले पूरे विमान को कंट्रोल किया था, अब अपनी माँ के सामने एक छोटे बच्चे की तरह रो रहा था।

“हाँ माँ… मैं हूँ। आपका रोहन।”

लक्ष्मी अम्मा की चीख निकल गई। उन्होंने दोनों हाथों से उसका चेहरा थाम लिया, जैसे डर हो कि कहीं वह गायब न हो जाए। “तू… तू सच में पायलट बन गया?”

रोहन हँसते हुए रोने लगा। “आपकी वजह से। अगर आपने फर्श न रगड़े होते, अगर आपने भूखे पेट काम न किया होता, तो मैं कभी यहाँ खड़ा नहीं होता।”

पूरा केबिन सिसकियों से भर गया। एक एयरहोस्टेस ने चुपचाप आँसू पोंछे। एक बूढ़ा आदमी सीट से उठकर ताली बजाने लगा, फिर पूरा विमान तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा।

लेकिन तभी एक और आवाज़ आई।

“यह सब नाटक बंद करो!”

पीछे की सीट से एक आदमी खड़ा हुआ। महँगा सूट, घमंडी चेहरा। उसकी आँखों में जलन साफ़ दिख रही थी। “यह फ्लाइट है, ड्रामा थिएटर नहीं। कैप्टन को कॉकपिट में होना चाहिए।”

केबिन फिर से चुप हो गया। लक्ष्मी अम्मा सहम गईं। उन्होंने रोहन का हाथ पकड़कर धीरे से कहा, “बेटा, जाओ… नौकरी मत खराब करना।”

रोहन खड़ा हुआ। उसने गहरी साँस ली और उस आदमी की ओर देखा। “सर, मैं अपनी ज़िम्मेदारी अच्छे से जानता हूँ। और यह फ्लाइट तब तक टेक-ऑफ नहीं करेगी, जब तक मेरी माँ से एक वादा पूरा न हो जाए।”

“कौन सा वादा?” आदमी ने तंज कसा।

रोहन ने माइक उठाया। “आज से दस साल पहले, जब माँ मुझे एयरपोर्ट छोड़ने आई थीं, तब उनके पास मेरे लिए टिकट खरीदने तक के पैसे नहीं थे। उन्होंने मुझसे कहा था—‘एक दिन मुझे भी तेरे जहाज़ में बैठना है, बेटे।’”

लक्ष्मी अम्मा फूट-फूट कर रो पड़ीं। “मैं तो मज़ाक कर रही थी…”

रोहन मुस्कराया। “और मैंने आज वह मज़ाक सच कर दिया।”

तभी फर्स्ट ऑफिसर कॉकपिट से बाहर आया। “कैप्टन, सब रेडी है।”

रोहन ने सिर हिलाया। फिर अचानक एक और चौंकाने वाली बात कही। “लेकिन आज इस फ्लाइट का पहला टेक-ऑफ कोई और करेगा।”

सब हैरान।

“मेरी माँ।”

“क्या?!” केबिन में शोर मच गया।

रोहन हँसा। “घबराइए नहीं। टेक्निकली नहीं। लेकिन सिम्बॉलिकली।”

उसने लक्ष्मी अम्मा को धीरे से उठाया। सबकी निगाहों के बीच वह अपनी माँ को कॉकपिट तक ले गया। लक्ष्मी अम्मा के हाथ काँप रहे थे। “बेटा, मैं अनपढ़ औरत हूँ… मुझे डर लग रहा है।”

रोहन ने उनकी हथेली कंट्रोल योक पर रखी। “डर मुझे भी लगा था, माँ। पहली बार अकेले रहने का, पहली बार उड़ान भरने का। लेकिन आपने कहा था—डर से बड़ा सपना होता है।”

लक्ष्मी अम्मा की आँखों से आँसू बहते रहे।

तभी अचानक एक और ट्विस्ट सामने आया।

फर्स्ट ऑफिसर ने कहा, “कैप्टन… एक पैसेंजर आपसे मिलना चाहता है। कह रहा है, ज़रूरी है।”

वही सूट वाला आदमी अंदर आया। उसका चेहरा अब सख़्त नहीं था। वह झिझका।

“मैं… मैं वही हूँ, जिसने दस साल पहले आपकी माँ को काम से निकाल दिया था,” उसने कहा।

लक्ष्मी अम्मा सन्न रह गईं। “आप…?”

“हाँ,” आदमी की आवाज़ काँप रही थी। “मैंने कहा था, ‘एक नौकरानी का बेटा पायलट नहीं बन सकता।’ आज… आज मैं उसी बेटे के जहाज़ में बैठा हूँ।”

वह झुक गया। “माफ़ कर दीजिए।”

लक्ष्मी अम्मा ने कुछ सेकंड उसे देखा। फिर उन्होंने रोहन की ओर देखा, फिर धीरे से कहा, “अगर मैंने माफ़ नहीं किया, तो मैं भी गरीब ही रह जाऊँगी… दिल से।”

पूरा कॉकपिट चुप था।

रोहन ने माइक ऑन किया। “देवियो और सज्जनो, हम टेक-ऑफ के लिए तैयार हैं।”

विमान धीरे-धीरे रनवे पर बढ़ा। लक्ष्मी अम्मा खिड़की से बाहर देख रही थीं। उनके चेहरे पर डर नहीं, शांति थी।

जब जहाज़ आसमान में उठा, उन्होंने आँखें बंद कर लीं।

“देखा माँ,” रोहन ने कहा, “हम उड़ रहे हैं।”

लक्ष्मी अम्मा मुस्कराईं। “नहीं बेटे… आज तो तू मुझे उड़ा रहा है।”

विमान बादलों के ऊपर स्थिर हो चुका था। सीट बेल्ट की लाइट बंद होते ही यात्रियों में हलचल शुरू हुई, लेकिन रो 42 के पास अब भी एक अलग ही माहौल था। लक्ष्मी अम्मा अपनी सीट पर बैठी थीं, हाथ में रोहन की उंगलियाँ थामे हुए, जैसे डर हो कि छोड़ते ही वह सब सपना टूट जाएगा।

“माँ,” रोहन ने धीरे से कहा, “आप थक गई होंगी। दस साल बाद इतनी लंबी फ्लाइट…”

लक्ष्मी अम्मा ने सिर हिलाया। “थकान तो थी, बेटा… लेकिन आज पहली बार मन हल्का है। लगता है जैसे कोई बोझ उतर गया हो।”

रोहन कुछ पल चुप रहा। फिर उसने गहरी साँस ली। “माँ, एक बात है… जो मैंने आज तक आपसे नहीं कही।”

लक्ष्मी अम्मा चौंक गईं। “क्या हुआ?”

रोहन की आँखें नम हो गईं। “जब आप विदेश गई थीं… पहले दो साल मैं बहुत गुस्से में था। मुझे लगता था आपने मुझे छोड़ दिया।”

लक्ष्मी अम्मा का दिल कस गया। “रोहन…”

“कॉलेज के पहले साल में,” वह बोलता गया, “मैंने पढ़ाई छोड़ने का फैसला कर लिया था। फीस बहुत ज़्यादा थी। मैं सोच रहा था कि कोई छोटी नौकरी कर लूँ।”

लक्ष्मी अम्मा के हाथ काँपने लगे। “फिर?”

“फिर एक दिन आपने वीडियो कॉल पर कहा था—‘अगर तू हार गया, तो मेरे दस साल बेकार हो जाएँगे।’”

रोहन मुस्कराया। “उस दिन पहली बार मुझे समझ आया कि आपने मुझे छोड़ा नहीं था… आपने खुद को कुर्बान किया था।”

लक्ष्मी अम्मा रोने लगीं। “मुझे माफ़ कर दे, बेटा… अगर तुझे अकेलापन महसूस हुआ।”

रोहन ने उनका हाथ चूम लिया। “नहीं माँ। आज अगर मैं कैप्टन हूँ, तो सिर्फ आपकी वजह से।”

तभी एक एयरहोस्टेस पास आई। “मैडम, कैप्टन ने आपके लिए कुछ भेजा है।”

लक्ष्मी अम्मा हैरान हुईं। “मेरे लिए?”

एयरहोस्टेस ने एक छोटा-सा लिफ़ाफ़ा दिया। अंदर एक फोटो थी—पुरानी, थोड़ी धुंधली। उसमें एक जवान लक्ष्मी अम्मा थीं, साधारण साड़ी में, और पास में एक छोटा लड़का, हाथ में काग़ज़ का जहाज़ पकड़े हुए।

पीछे लिखा था:
“माँ, इस दिन से आज तक… यही मेरा ईंधन था।”

लक्ष्मी अम्मा की आँखों से आँसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे।

लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।

थोड़ी देर बाद, वही सूट वाला आदमी फिर आया। इस बार उसके हाथ में एक फ़ाइल थी।

“लक्ष्मी जी,” उसने संकोच से कहा, “मैं एक एविएशन कंपनी का डायरेक्टर हूँ। आज इस फ्लाइट में बैठना मेरे जीवन का सबसे बड़ा सबक बन गया।”

रोहन सतर्क हो गया। “आप कहना क्या चाहते हैं?”

आदमी ने फ़ाइल खोली। “हम एक स्कॉलरशिप फाउंडेशन शुरू कर रहे हैं… उन बच्चों के लिए, जिनके माता-पिता घरेलू कामगार हैं।”

लक्ष्मी अम्मा अवाक् रह गईं। “मेरे जैसे लोगों के लिए?”

आदमी ने सिर झुका दिया। “हाँ। और हम चाहते हैं कि इसका नाम हो—लक्ष्मी अम्मा फाउंडेशन।”

पूरा केबिन फिर से तालियों से गूँज उठा।

लक्ष्मी अम्मा ने कांपती आवाज़ में कहा, “मैं पढ़ी-लिखी नहीं हूँ… मैं क्या करूँगी?”

रोहन ने मुस्कराकर कहा, “आप उम्मीद बनेंगी, माँ। जैसे आप मेरे लिए बनीं।”

फ्लाइट लैंडिंग की तैयारी करने लगी। दिल्ली की ज़मीन नज़दीक आ रही थी।

लक्ष्मी अम्मा ने खिड़की से बाहर देखा। उनकी आँखों में अब दर्द नहीं, गर्व था।

“बेटा,” उन्होंने कहा, “मैंने सोचा था कि मैं सिर्फ तुझे पायलट बनते देखूँगी… लेकिन आज समझ आया, मैं एक माँ से कुछ और भी बन गई हूँ।”

रोहन ने पूछा, “क्या?”

उन्होंने मुस्कराकर जवाब दिया, “एक मिसाल।”

विमान ज़मीन पर उतरा। जैसे ही पहिए रनवे से टकराए, यात्रियों ने खड़े होकर तालियाँ बजाईं।

रोहन ने आख़िरी घोषणा की। “आज की यह उड़ान सिर्फ एक सफ़र नहीं थी। यह उस विश्वास की कहानी थी, जो एक माँ ने अपने बेटे पर किया।”

लक्ष्मी अम्मा की आँखों से एक आख़िरी आँसू गिरा—दुख का नहीं, जीत का।

विमान पूरी तरह रुक चुका था, लेकिन किसी को भी अपनी सीट छोड़ने की जल्दी नहीं थी। ऐसा लग रहा था जैसे हर यात्री इस कहानी का हिस्सा बन चुका हो। लक्ष्मी अम्मा अब भी खिड़की के पास बैठी थीं, उनके हाथ में वही पुरानी फोटो थी, जिसे वह बार-बार देख रही थीं, जैसे यह यक़ीन करना चाहती हों कि यह सब सच है।

रोहन ने इंटरकॉम बंद किया और अपनी माँ के पास आकर बैठ गया। इस बार वह कैप्टन नहीं था—सिर्फ एक बेटा था।

“माँ,” उसने धीमी आवाज़ में कहा, “घर चलें?”

लक्ष्मी अम्मा ने उसकी ओर देखा। “घर?” उन्होंने हल्की-सी मुस्कान के साथ दोहराया। “कितने साल हो गए यह शब्द सुने हुए…”

तभी अचानक एक और मोड़ आया।

एक एयरपोर्ट अधिकारी विमान में चढ़ा। उसके साथ दो लोग और थे—एक महिला और एक बुज़ुर्ग पुरुष। महिला को देखते ही लक्ष्मी अम्मा का दिल जोर से धड़कने लगा।

“सरिता…?” उनके होंठ काँप उठे।

वह उनकी छोटी बहन थी।

दस साल पहले, जब लक्ष्मी अम्मा विदेश जा रही थीं, तब सरिता उनसे नाराज़ थी। उसने कहा था, “पैसों के लिए बच्चे को छोड़ रही हो।” उस दिन के बाद दोनों के बीच बात नहीं हुई थी।

सरिता धीरे-धीरे आगे बढ़ी। उसकी आँखों में आँसू थे। “दीदी… मैं गलत थी।”

लक्ष्मी अम्मा कुछ बोल नहीं पाईं। रोहन ने चुपचाप अपनी माँ का हाथ थाम लिया।

सरिता ने रोहन की ओर देखा—पायलट की वर्दी में। “मैंने सोचा था पैसा सब कुछ खराब कर देगा… लेकिन आज समझ आया, तुम्हारी माँ ने पैसों से नहीं, अपने खून से सपना सींचा था।”

दोनों बहनें गले लग गईं। दस साल की खामोशी, एक पल में टूट गई।

बुज़ुर्ग व्यक्ति आगे आए। “लक्ष्मी,” उन्होंने कहा, “मैं तुम्हारा पिता हूँ… और मुझे तुम पर गर्व है।”

यह सुनकर लक्ष्मी अम्मा फूट-फूट कर रो पड़ीं। इतने सालों से वह यही सोचती रहीं कि वह सिर्फ एक नौकरानी हैं, एक साधारण औरत। आज पहली बार उन्हें महसूस हुआ कि उनका संघर्ष किसी पहचान से कम नहीं था।

एयरपोर्ट के बाहर मीडिया खड़ी थी। किसी ने यह कहानी पहले ही वायरल कर दी थी। कैमरे, माइक, सवाल—

“मैडम, आपने दस साल अकेले कैसे काटे?”
“कैप्टन, आपकी सफलता का राज़ क्या है?”

लक्ष्मी अम्मा ने माइक पकड़ा। उनकी आवाज़ काँप रही थी, लेकिन शब्द सच्चे थे।

“मैंने कुछ खास नहीं किया,” उन्होंने कहा। “मैंने बस एक माँ की तरह किया। अगर आज मेरा बेटा आसमान में उड़ रहा है, तो इसलिए नहीं कि वह बहुत बड़ा है… बल्कि इसलिए कि कभी-कभी माँ खुद ज़मीन पर रेंगती है, ताकि बच्चा उड़ सके।”

पूरा एयरपोर्ट तालियों से गूँज उठा।

कुछ महीनों बाद…

लक्ष्मी अम्मा फाउंडेशन आधिकारिक रूप से शुरू हो चुका था। पहली स्कॉलरशिप पाने वाले बच्चों में से एक लड़की थी—घरेलू कामगार की बेटी।

लड़की ने कांपती आवाज़ में पूछा, “अम्मा, क्या मैं भी पायलट बन सकती हूँ?”

लक्ष्मी अम्मा ने उसके सिर पर हाथ रखा। “बेटी, सपनों की कोई जात, कोई हैसियत नहीं होती।”

रोहन दूर से यह दृश्य देख रहा था। उसकी आँखों में आँसू थे, लेकिन चेहरे पर संतोष।

उस रात, घर लौटकर लक्ष्मी अम्मा ने पहली बार अपने ही बिस्तर पर चैन की नींद ली। न कोई अलार्म, न कोई विदेशी रसोई, न कोई आदेश।

सोने से पहले उन्होंने आसमान की ओर देखा और बुदबुदाईं,
“भगवान, आपने मेरा बेटा नहीं बदला… आपने मेरी किस्मत की परिभाषा बदल दी।”

कहानी यहीं खत्म नहीं होती।

यह हर उस माँ की कहानी है, जो चुपचाप अपने सपनों को दबाकर, अपने बच्चों के सपनों को पंख देती है—बिना यह जाने कि एक दिन वही बच्चे उन्हें पूरे आसमान का मालिक बना देंगे।